करौली में गौशालाएँ एवम गोपाष्टमी महोत्सव

करौली में गौशालाएँ एवम गोपाष्टमी महोत्सव


कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा के बाद सप्तमी तक भगवान श्रीकृष्ण ने गो –गोप –गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था l गायों की रक्षा करने के कारण श्रीकृष्ण का नाम गोविन्द पड़ा l उसी समय से कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी का उत्सव मनाया जाने लगा l

करौली यदुबंशी शासकों की राजधानी रही है l भगवान श्रीकृष्ण यदुवंश शिरोमणि तथा यदुवंश के आदर्श हैं l बैसे तो गाय मानव मात्र को पोषित करने वाली माता है, किन्तु यदुवंशियों के लिए विशेष पूजनीय है l

करौली में गोपालन प्राचीन काल से ही जनसाधारण द्वारा किया जाता तथा गोपाष्टमी के दिन घरों पर गोमाता का विधि विधान से पूजन किया जाता था l राजा भ्रमरपाल द्वारा 1894 ई 0 में गोशाला निर्माण के लिए भँवर विलास करौली बाग में चिमनसिंह को निशुल्क भूमि देने का उल्लेख है l

चिमन सिंह के गो भक्त पुत्र मदन सिंह ने 1913 ई 0 में अपनी हवेली के नोहरे में निजी गोशाला की स्थापना की थी l यादवबाटी गोशाला की स्थापना भी राजा भोमपाल द्वारा 1932 ई0 में की गई थी l वर्तमान में यह करौली जिले की सबसे प्राचीन गोशाला संस्था के रूप में 1958 ई0 से पंजीकृत है l गो शाला अधिनियम के तहत 1971 से पंजीकृत इस गोशाला को दिया गया दान आयकर अधिनियम की धारा 80 जी के अधीन करमुक्त है l

जवाहर लाल चतुर्वेदी एवम हरकिशन लाल की अदयक्षता में गोशाला का आशातीत विकास हुआ था l दिवंगत श्यामसुंदर लवानिया एवम वर्तमान अध्यक्ष मुन्ना सिंह ने भी गौशाला के विकास के लिए सराहनीय कार्य किए हैं l इसी गोशाला की धौलपुर मार्ग पर ठेकरा में भी शाखा है l लगभग 2 हजार गोवंश का संरक्षण इस गोशाला में हो रहा है lइस श्रेष्ठ गोशाला को गणतन्त्र दिवस 2017 पर जिला प्रशासन द्वारा सम्मानित किया जा चुका है l

मदनमोहंनजी मंदिर प्रबन्धन द्वारा भी करौली राज पंचायती सार्वजनिक गोशाला स्थापित की गई ,जिसके 1935 से 1938 तक वीरेश्वर किशोर गोस्वामी सभापति रहे l इन सभी गोशालाओं में गोपाष्टमी समारोह धूम धाम से मनाए जाते थे l गोसेवक मदन सिंह एवम डा0 श्याम चतुर्वेदी ने गाय की महिमा पर आधारित पुस्तकों की रचना करके लोगों को गोसेवा के लिए प्रेरित किया l


गोपाष्टमी पर गो सेवक राजा की सवारी विशेष कौतूहल पूर्ण होती थी l करौली राजमहल से निकलने वाली सवारी में सबसे आगे एक हाथी पर करौली रियासत के निशान को लेकर फैलू चौवे बैठते थे साथ ही नगाड़ा बजता हुआ चलता था l इसके बाद ठाकुरजी के चाँदी के होदे वाला हाथी फिर क्रमशः नाचते हुए खासा घोड़े ,पलटन के जवान तदोपरांत सौने के होदे वाले हाथी पर आगे स्वयं राजा भोमपाल एवम पीछे दो सरदार गिरवर सिंह एवम विशाल सिंह चँवर एवम मोरछल लेकर बैठते थे l

इसी हाथी के आगे बैकुंठ चौवे कृष्ण बनकर अपने ग्वाल बालों के साथ मनोहारी नृत्य करते हुए आगे बढ़ते थे साथ ही प्रचलित गीत ‘फूलों के गजरे ,फूलों की माला ,गऊ चरावन चले नंदलाला ‘ गाते थे l सवारी का समापन बर्तमान पावर हाउस के पास होता था ,जहां करौली नगर की एकत्रित गायों को स्वयं राजा पूजते थे तथा गाय एवम गोपालकों को मीठी एवम नमकीन पपड़ी खिलाते थे l

यह पर्व करौली राजबंश की दीर्घकालीन परम्पराओं का प्रतीक था l वर्तमान में यादव बाटी गोशाला से जुड़े गो भक्त सुसज्जित गायों की पूजा के बाद शहर के प्रमुख मार्गों से गो समूह की शोभा यात्रा निकालते है l मदनमोहंनजी के मंदिर में भी परंपरागत रूप से यह उत्सव मनाया जाता है l

प्रस्तुति –वेणुगोपाल शर्मा ,इतिहासकार,करौली

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