करौली का नींदर गांव कुँवर मदन सिंह जी की डायरी से - आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व करौली के गावो का भृमण

करौली का नींदर गांव कुँवर मदन सिंह जी की डायरी से - आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व करौली के गावो का भृमण


आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व करौली के गावो का भृमण -- इस प्रकार से अगले दिन हम घाटी ओर नाले को पार करते हुए नीदर ग्राम में पहुंचे। यह बात लिखने से रह गई थी कि जिस घाटी से हम लोग उतरे वह एक मील की और बड़ी भयावह थी जिसमें सिंह, बघेरे, भालुओं  का दिन में भी भय  था, हा तो हम इस प्रकार नींदर पहुंचे। 


करौली की राजधानी पहले तिमनगढ़ थी उसके बाद नींदर उसके बाद बहादुरपुर और उसके बाद करौली बनाई गई। ऐतिहासिक दृष्टि से नींदर ग्राम महत्व का है,किंतु यहाँ राजधानी की कोई विशेष चिन्ह नहीं केवल एक गढ़ी है, वह भी टूट गई है। वर्षा काल में तो उसकी यह दशा है, कि यदि आज गढ़ी की छतों पर पानी बरसा दो तो वह 2 दिन तक पानी बरसा देगी।

गढ़ी के बाहर एक सूरबाबा का चबूतरा है, जबकि यह भी किसी को नहीं पता कि यह सूरबाबा कौन है,इन पर मिठाई चढ़ती है, श्री महाराज जब नींदर पधारते हैैं तो बकरा चढ़ाया जाता है। इससे यह सूचित होता है कि यह सूर लड़ाई में शूरवीरता दिखा कर मरा होगा पास ही साधु  की कुटी है। पहले यह गांव बड़ा था किंतु अब बहुत  कुछ उबड़ खाबड़ सा हो गया है। यहां पर पाठशाला के लिये लोगों को उत्साहित किया उनको विद्या के लाभ समझाए बड़ी कठिनाई से आठ-दस मनुष्यों की समझ में बात आई तब प्रयत्न करके पाठशाला खुलवाई। रात्रि को यही शयन करने की ठानी।


फिर अगले दिन पो फटी तारागण खिसकने लगे,उल्लुओं ने भागकर घोसलों की शरण ली, भगवान भास्कर लाल आँखे कर निकले हम लोगो ने भी शौच आदि से निवृत्त होकर पाठशाला की व्यवस्था ठीक ठाक करके चलने की ठानी । ज्यो ज्यो दिन चढ़ता गया ज्यो दिनेश आग बरसाते बढ़ते थे।  हम लोग एक घाटी में चढ़े यह घाटी छोटी थी,  ऊपर चढ़कर देखा एक जगह जल जोर से गिर रहा था।

वहां पर स्वर्गीय श्री महाराज गोपाल सिंह जी का आखेट करने का भाला तना हुआ था, बहा बैठकर साथियों ने वस्त्रों में साबुन लगाया फिर वहां से झाड़ियों को पार करते हुए एक ऊंची घाटी के मुहाने पर पहुंचे यहां से और भी अच्छा सौन्दर्य देख पड़ता है।  सायकाल के पांच बज चुके थे उत्तर में प्रलय काल की सी काली घटाएं उठ रही थी।

वर्षा आरंभ हुई हम लोगों में से एक आदमी मेरे ससुराल पचो उत्तरप्रदेश का था उस बेचारे का क्या काम पड़ा जो ऐसी विकट घड़ी में सिंह बघेरो के घेरे में रहे। बह घबराने लगा हमने जैसे तैसे रोधई की सीधी घाटी उतरना आरंभ किया, इस घाटी में बैठ बैठ कर उतरते थे, यदि पैर फिसल गया तो शरीर के अवयव बिना टूटे रह नहीं सकते। ज्यो ज्यो करके घाटी उतरे, उस समय वर्षा ने हम लोगों पर कृपा की और मंडरायल की ओर झुक पड़ी उस दिन पौने दो इंच पानी गिरा। हम नींदर से मध्यान्ह के चले हुए सायकाल के छ: बजे रोधई ग्राम में पहुंचे।


लेख कुँवर साहब द्वारा लिखित लेख के अंश है।
कुँवर धर्मेंद्र सिंह काचरोदा

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