करौली का श्यामपुर गांव :- क्रांतिकारी कुंवर मदन सिंह की डायरी से :-------

करौली का श्यामपुर गांव :- क्रांतिकारी कुंवर मदन सिंह की डायरी से :-------


आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व करौली के गांवों का भृमण :-

करौली का श्यामपुर गांव क्रांतिकारी कुंवर मदन सिंह की डायरी से  भाग दो :-

श्रवण शुक्ल 12 इस प्रकार हम लांगरा से लगभग 2 कोस की यात्रा समाप्त कर सूर्यास्त के समय श्यामपुर गांव पहुंचे,ग्राम में पहुंचकर भोजन आदि से निवृत्त होकर शयन करने की ठानी मनुष्य का दर्पचूर्ण करने वाले मच्छरों से सारी रात युद्ध करना पड़ा वीर मच्छर अपठित मनुष्यों से ही युद्ध करते हो ऐसा नही, इन नन्हे से जीवो ने यूरोप ब भारत के डॉक्टरों के होश हवास उड़ा रखे है जैसे जैसे डाक्टर इन्हें मिटाना चाहते है ,त्यों त्यों ये इसके समान- जस जस बदन बढ़वा। तासु दुगुणं कपि रूप दिखावा 
मेरे संकल्प के अनुसार जब तक करौली माता के मस्तक से प्रजा को निर्धन बनाने वाली बेगार प्रथा न उठ जाएगी तथा जब तक न्यायालय में हिंदी भाषा को आसन न मिलेगा ,जब तक हिंसक जानवरों को मारने की प्रजा को आज्ञा ने मिलेगी तब तक मैं पृथ्वी पर शयन करूंगा पैरों में उपानह या खड़ाऊ तक ने पहनुगा और भोजन ने करके दुग्ध फल,कंद साग पर ही निर्भर रहूंगा (केवल फलाहार करूंगा किंतु यह सब करौली की सीमा के भीतर) अब नंगे पैर पैदल यात्रा करने की बारी आई नुकीले कंकड़ पावो का स्वागत करते तो कांटे पीछे  क्यों रहने लगे यहां पर विविध प्रकार की तृण है, जिनके दो तृण तो ऐसे हैं जो अपनी सुगंधी से बहुत दूर तक जंगल को सुगंधित बनाते हैं।

जिनमें से एक का नाम रोसा है, यह तृण 4 फुट ऊंचा होता है, इसके पत्ते लंबे आते हैं। गंधी लोग इसका इत्र बनाते हैं, यह घास यहा पर बहुतायत से होती है, इसको पशु कम चरते हैं, इसकी सुगंध बड़ी मनभावनी होती है दूसरा तृण गन्धल होता है,यह तृण भी 4 फुट ऊंचा होता है इसमें बांस की दुर्गंध आती है इसकी सुगंध भी दूर तक जाती है इसको पशु बड़ी प्रसन्ता से चरते हैं, यहां तक कि जो गाय इसे अधिकता से चरती है उनके कच्चे दूध में से भी सुगंध आ जाती है, यह तृण भी यहाँ अधिकता से होता है।

इसी प्रकार बहुत प्रकार की औषधियों को देखते भालते चल रहे थे, इतने में एक पहाड़ की चट्टान पर पहुंचे चट्टान पर जो दृश्य देखा गया उसका लिखना लेखनी की शक्ति से बाहर है, यहां से नीचे लगभग 8 या 10 कोस तक का भूभाग दिखलाई पड़ता है। जिसमे हरियाली या जल या आकाश था जिस समय हम लोग बैठे थे, बादल नीचे कंदरा खेतों में विचरण कर रहे थे। उनका अजीव दृश्य देखकर हृदय में विचार धारा बहती थी अच्छा हो कि इस जगह पर तुलसी कुटीर या कन्याओं के लिए सीता कुटीर बनाया जाए,  शांति निकेतन के लिए तो यह अद्वतीय स्थान है, जलवायु सौन्दर्य सब एक से एक बढ़कर इन सब विचारों की उथल पुथल ह्रदय  में मच रही थी, यहाँ विश्राम क्या किया यहाँ से उठने की जो न चाहता था।

किंतु उदास मुख से उठना पड़ा मातृभूमि की वंदना गाते हुए एक मीन की घाटी उतरना प्रारंभ किया घाटी क्या थी  आफत की घाटी थी येनकेन प्रकरेण तृभवन नाथ की चतुराई देखते हुए बड़ी कठिनाई से इन विंध्याचल की पर्वत मालाओं को उतर पाए। यह सब दृश्य मनोमुग्धकारी था, किंतु जिस मार्ग से यात्रा करें उसी में मस्तक पर बोझ लिए बेगरियो का ताता दिख रहा था  जिसे देखकर मस्तक पर सिहर उठता, ह्रदय घबराता, आंखें गर्म हो जाती थी। अरस्तु इस प्रकार की घाटी उतरकर नाले से पार करते हुए,हम लोग नींदर ग्राम पहुंचे।


(लेख कुंवर मदन सिंह जी की यात्रा का सूक्ष्म विवरण है।)
कुंवर धर्मेंद्र सिंह काचरोदा

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