करौली की सांझी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व

करौली की सांझी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व


मित्रो- सांझी करौली की सांस्कृतिक विरासत है l पूर्व देशी रियासत करौली यदुबंशी नरेशों के अधीन शासित होने के कारण यहाँ राधा कृष्ण को आराध्य मानकर पूजा जाता है l श्री मदनमोहंनजी मंदिर को इस परम्परा का प्रणेता कहा जा सकता है l सांझी पित्र पक्ष में भाद्र पद माह की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की पित्र मोक्ष अमावस्या तक चलने वाला 16 दिवसीय पर्व है l

इसमें सायंकाल बनाए जाने वाला अलंकरणों का संकलन आधार भूत तथा पारंपरिक होता है l बृज क्षेत्र के बैष्णव मंदिरों से यह संस्कृति विकसित हुई है l यहाँ किशोरियाँ राधा –कृष्ण की आकृतियाँ गोवर से बनाकर अपने घरों की दीवारों पर चिपकाती हैं तथा सायंकाल उनका पूजन करती हैं l ऐसी भी मान्यता है कि इस दौरान कन्याएँ सांझी को वरदायिनी देवी के रूप में पूजती हैं l इस दौरान सांझी गीत भी गाये जाते हैं l


संजा को ब्रम्हा कि मानस पुत्री माना जाता है l संजा की अपूर्व सुंदरी के रूप में कल्पना कि गई है l देवी स्वरूपा संजा सूर्य के रथ पर सवार हो कर आती है l चाँद,सूरज उसके भाई हैं l कन्याएँ अच्छे वर ,सुखी भावी संसार की कामना लिए संजा पर्व सहेलियों के साथ मनाती हैं l


मदनमोहन जी के मंदिर की सांझी बृजमंडल में श्री कृष्ण की लीला स्थली से जुड़ी हुई है l

सांझी में प्रतिदिन क्रमश :                                                             पूर्णिमा – कमल  

प्रतिपदा – मधुवन ,तालवन ,कुमोदवन ,वहुलावन 

द्वितीया  – शांतनु कुंड 

तृतीया  -  राधा कुंड

,चतुर्थी – कुसुम सरोवर 

पंचमी - गोवर्धन 

छठ - कामवन

,सप्तमी – बरसाना 

अष्टमी  – नंदगाव 

नवमी – कोकिला वन

दशमी – शेषशायी कोडानाथ 

एकादशी - वृन्दावन 

द्वादशी – मथुरा 

त्रियोदशी – गोकुल 

चतुर्दशी – दाऊजी

एवम अमावस्या के दिन कोट बनाया जाता है,

जिसमें राधा –कृष्ण की युगल झांकी होती है l पित्र मोक्ष अमावस्या को संजा पर्व का समापन विदाई समारोह से होता है l


सांझी का अंकन एक मिट्टी के चबूतरे पर गुलाल से किया जाता है l इस कार्य में मंदिर के सेवायत निपुण हैं l लंबे समय तक इस मंदिर में सांझी बनाने का कार्य दिवंगत गजानन्द भट्ट करते थे l वर्तमान मे उनके परिजन अन्य सहयोगियों के साथ कर रहे हैं l

सांझी परंपरा को करौली में आगे बढ़ाने का कार्य मदनमोहनजी के पंडित परिवार से नित्यानन्द शर्मा एवम चौबे पाड़े के पंडित मोतीलाल जलपाईवाले के पुत्र भागीरथ लाल ने किया l ये अपने घर पर ही प्रतिदिन सांझी बनाते थे l इस कार्य को पूरे दिन में अनेक लोग मिलकर अंजाम देते थे l सांझी बनाने के लिए गुलाल एवं सूखे रंगो की सहायता से प्रतिदिन नया रूपांकन होता था l यह सांझी हाथ से बने स्टेंनसिल के माध्यम से चित्रित की जाती थी l

रंगो की विविधता का कमाल छोटी छोटी आकृतियो की वेश-भूषा एवं आभूषणों में देखने को मिलता था l सम्पूर्ण सांझी की पृष्ठ भूमि में श्रीकृष्ण लीलाएँ ही प्रतिबिंवित होती थी l बृज चौरासी कोस की परिक्रमा मार्ग के स्थानो का चित्रण भी सांझी में देखने को मिलता है l किशोरियों द्वारा तो अब भी अपने घरों के द्वार पर गोवर से सांझी बनाकर पूजा करने की परम्परा प्रचलित है l

स्टेंसिल से सांझी


प्रस्तुति –वेणुगोपाल शर्मा ,इतिहासकार ,करौली

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