अब दिल्ली दूर नही

अब दिल्ली दूर नही


नेताजी सुभाषचंद्र बोस को समर्पित 

 

....अब दिल्ली दूर नही...

 

सल्तनत काल ख़त्म हो चुका था देश मुग़लों के हाथ से निकल कर फिंरगीयों के क़ब्ज़े में जा चुका था। 

 

देश के कोने कोने में आज़ादी के लिये संघर्षों का दौर शुरू हो चूका था , हर तरफ देश में ग़दर का माहौल था।

बरसों की ग़ुलामी ने हिन्दोस्तान युवाओं के सपनों और होसलों  को तोड़कर रख दिया था। 

 

ऐसे में टूटते सपने और होसलों को नयी उर्जा देने का काम किया नेताजी सुभाषचंद्र बोस कीआज़ाद हिंद फ़ौज ने।यह वही फ़ौज थी जिसका गठन नेताजी ने द्वितीयविश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों ख़िलाफ़ लड़ने के लिये जापान की मदद से किया था।

 

वैसे तो माना जाता है की देश में आज़ादी चरखे की ताक़त , डांडी मार्च या सत्याग्रह के बदौलत आयी है पर कहानी कि वास्तविकता कुछ और ही थी। 

 

हालाँकि हम इस बात को नकार भी नही सकते की गांधीजी के सत्याग्रहों व असहयोग आंदोलनों ने लोगों को अपने अधिकारो के लिए एकजुट होकर लड़ना सिखाया , किन्तु आज़ादी का पुर्ण श्रेय गांधीजी को देना भगतसिंह , राजगुरू ,चंद्रशेखरआज़ाद , अशफाकुल्ला व नेताजी जैसे अमर शहीदों की शहादत काअपमान होगा।

 

21 अक्टूबर1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसेजर्मनीजापानफिलीपींसकोरियाचीनइटलीमान्चुकोऔरआयरलैंडनेमान्यतादी।जापाननेअंडमान व निकोबार द्वीपइस अस्थायी सरकार को दे दिये।सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।

 

फिर वो समय भी आया जब नेताजी ने ग़ुलाम भारत को आज़ाद कराने के लिये अंग्रेज़ों की सेना पर निरंतर हमले करना शुरू किया।लगातार हमलों से ब्रिटिश सेना को कई मोर्चों से पिछे हटना पड़ा। 

 

आख़िर वो दिन भी आया जब नेताजी ने जुलाई 1944 को रंगुन रेडियो स्टेशन से हिन्दोस्तान की आवाम व महात्मागांधी के नाम संदेश जारी कर अंतिम व निर्णाय क युद्ध के लिये आशीर्वाद मांगते हूए कहा #अब_दिल्ली_दूर_नही । 

 

पर शायद नियती को कुछ और ही मंज़ूर था।18 अगस्त 1945  को एक हवाई दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गयी। 

 

वैसे इस दूर्घटना में उनकी मृत्यु हूई या नही यह अभी भी संदेहास्पद है।अकसर लोगों में बंगाली बाबा या मौनी बाबा के रूप मे उनके देखे जाने ख़बरें आम रही हैं।ख़ैर बीते कुछ सालों पहले वो मौनी बाबा भी देवलोक हो गये और अपने पीछे छोड गये कई अनसुलझे सवाल।

 

1320 में हज़रतनिज़ामुद्दीन औलिया ने कहा था“ हनोज दिल्ली दूर अस्त ” जिसे किसी भी कार्य की पुर्णता पर संदेह होने के क्रम में एक नकारात्मक वाक्य माना जाता है वहीं सदियों बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा कहे गये वाक्य “अब दिल्ली दूर नही ” ने देश के यूवानो मे नयी सकारात्मक उर्जा का संचार किया।

 

आज 18  अगस्त है नेताजी सुभाष की पुण्यतिथि , नेताजी  राजनेतिक रूप से अपने ही देश की सरकारों से उपेक्षित रहे पर हिन्दोस्तानी दिलों में वो आज भी अजर अमर हैं।उनके द्वारा ज़िंदा किये गये युवान होसलों व सपनों की उड़ान दिन व दिन उंची हो रही है और हो भी क्यों ना आख़िर “ अब दिल्ली दूर नही ”

 

1957  में महान फ़िल्मकार राजकपूरसाहब ने रस्किन बोंड की लिखी कहानी पर एक फ़िल्म बनाई जिसका शीर्षक रखा- अब दिल्ली दूर नही , जिसने इस वाक्य की सकारात्मक को और प्रबल करनये सफलता के नये मुहावरे के रूप मे स्थापित कर दिया।

 

विषय- अब दिल्ली दूर नही

लेखक- विक्की सिंह सपोटरा

दिनांक- 18 अगस्त2019 

 

 

 

 

 

 

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