एक दिन का आतंकवादी । सफरनामा

एक दिन का आतंकवादी । सफरनामा


 

सफ़रनामा

बात 23 अगस्त 2019 की है। हम अपनी बनारस यात्रा से वापस आ रहे थे साथ में कुछ फ़िरंगी पर्यटक भी थे जिनकी फ़्लाइट हमसे कुछ घंटे पहले थी। 

हमने सोचा कौन दो बार एयरपोर्ट आने जाने की आफ़त करता सो हम भी अपना सामान बाँध कर उन्हीं के साथ बनारस के लाल बहादूर शास्त्री एयरपोर्ट आ धमके।

“सर आपकी फ़्लाइट तो साढ़े छह बजे हैं और अभी तो साढ़े बारह भी नही हूए? इतना जल्दी चेक इन ? “- एयरपोर्ट पर एन्ट्री से पहले टिकट चेक करते हूए लड़की ने पुछा।

“जी वो मेरे साथ कुछ फ़्रांसीसी पर्यटक भी हैं जिनकी फ़्लाइट सवा तीन बजे है तो दो बार कौन बनारस जाये-आये इसीलिये इन्ही के साथ सामान बाँध कर आ गया” - हमने अपना पक्ष रखते हूए कहा।

 “ ठिक है, अपनी हेट हटाइये” -उसने मुझे संदेह से देखते हूए आदेश दिया।

मेरे साथ आये पर्यटक चेक इन कर उनकी फ़्लाइट के लिये निर्धारित गेट नम्बर चार पर चले गये लगभग एक घंटे से उपर हो चूका था। इधर मैं अकेला एयरपोर्ट पर बैठा शाम होने होने का इंतज़ार कर रहा था।

मेरे साथ आये पर्यटक चेक इन कर उनकी फ़्लाइट के लिये निर्धारित गेट नम्बर चार पर चले गये लगभग एक घंटे से उपर हो चूका था। इधर मैं अकेला एयरपोर्ट पर बैठा शाम होने होने का इंतज़ार कर रहा था।

“आप फ़िल्मों में काम करते है?” -सामने वाली सीट पर बैठे हूऐ एक महाशय ने अपनी पैनी निगाहों से मेरे किरदार और मेरे लगेज का लगभग आँकलन करते हूए पूछा।

“आप फ़िल्मों में काम करते है?” -सामने वाली सीट पर बैठे हूऐ एक महाशय ने अपनी पैनी निगाहों से मेरे किरदार और मेरे लगेज का लगभग आँकलन करते हूए पूछा।

 “जी नही अंकल मैं तो ट्युअर गाइड हूँ यहाँ बनारस अपने विदेशी मेहमानों के साथ घुमने आया था, अब वापस दिल्ली जा रहा हूँ” - मैंने तफ्सील से जवाब देते हूए कहा।

अंकल पहली बार हवाई यात्रा कर रहे थे इसिलिये शायद वो आंटी के साथ सेल्फ़ी लेने का दुष्कर प्रयास कर रहे थे। 

आदतन फ़ोटोग्राफ़र होने के कारण मेने अंकल से उनका मोबाइल लेकर आंटी और उनकी दो तीन तस्वीरे खींच डाली।

मुम्बई की फ़्लाइट का समय हो चूका था अब अंकल जी भी अपने गंतव्य की और बढ़ चूके थे सो हम फिर ख़ाली के ख़ाली।

अभी भी लगभग तीन ही बजे थे ।

 लम्बे इंतज़ार के अलावा हमारी क़िस्मत में कुछ और बचा भी नही था करने के लिये।

 लम्बे इंतज़ार के अलावा हमारी क़िस्मत में कुछ और बचा भी नही था करने के लिये।

कहते है की मर्दों को फाल्तू समय में दो ही चीज़ें ज्यादा आती हैं, एक तो सिगरेट की तलब और दूसरा बार बार पैशाब, सो हम भी चल दिये वॉशरूम की तरफ।

हमने अपना लगेज और हेट वहीं सीट पर छोड दिया पर अपना केमरा साथ मे लेना उचित समझा क्योंकि पहले भी हम अपना एक कैमरा टूर के दौरान चोरी करवा चूके हैं , सो इस बार कौन रिस्क लेता।

अभी वॉशरूम से लोटे ही थे की याद आया हमारे चेक इन लगेज का वज़न सत्रह किलो है और फ़्लाइट में सिर्फ पंद्रह किलो तक ही अलाऊ है, मानसिक ग़रीबी ने तुरंत सलाह दी की भाई कुछ सामान अपने हेंड बेग में डाल लो फ़ायदे में रहोगे,समय और पैसा दोनों ही बचेंगे।

जहनी सलाह पर अख़्तियार करते हूए हमने एयरपोर्ट पर एक कोना तलाशा और जा पहुँचे उस कोने वाली सीट पर सामान सहित।

अभी लगेज खोला ही था की दो लम्बे चौड़े आदमी हमारी छाती पर आ खड़े हूए। 

हम कुछ समझ पाते उससे पहले उन्होंने हम पर अपना पहला सवाल दाग दिया।

“आप कहाँ जायेंगे?” - ऑफ़िसर से दिखने वाले व्यक्ति ने पूछा। “

 जी दिल्ली” मेने जवाब देते हूए कहा। “मगर जहाँ आप बैठे है वहाँ से तो शारजाह के लिये फ़्लाइट जायेगी”- उसने अपना शक ज़ाहिर करते हूऐ कहा। मैं कुछ बोल पाता उससे पहले साथ वाले ऑफ़िसर ने कहा “ अपना टिकट दिखाइये” हम्म “और आपकी ID “ उसने टिकट को ध्यान से देखते हूए कहा।

“वो रहा केमरा” पहले वाले ऑफ़िसर ने मेरी हेट के नीचे दबे हूऐ केमरे की तरफ इशारा करते हूए कहा। यह सुनते ही दूसरे ऑफ़िसर की निगाहों में यूँ अजीब सी चमक दिखाई दि मानो किसी आतंकी के ज़ख़ीरे में केमरा नही बम मिल गया हो। “क्या हूआ? और आप लोग कौन हैं? “ मैंने लगभग असहज होते हूए पूछा।

“हम लोग इंटेलिजेंस से है और आप पिछले तीन घंटों से हमारे सर्विलिअंस_ऑबजर्वेशन पर है” पहले वाले ऑफ़िसर ने परिचय देते हूए कहा।

अब चौंकने की बारी मेरी थी। “ पर क्यों? ऐसा क्या किया है मैंने ?” खुद को सम्भालते हूए मैंने पुन: प्रश्न किया।

“आप गाइड हैं?” उसने मेरी हेट की तरफ इशारा करते हूए पूछा। “जी हॉं”, “तो आपके पर्यटक कहाँ है? “मैं अपनी बात पूरी कर पाता उससे पहले उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया। “वो चले गये, मेरी फ़्लाइट लेट है इसिलिये यहाँ बैठा इंतज़ार कर रहा हूँ” -मैंने अपनी बात रखते हूए कहा।

“आप कुछ देर पहले यहाँ वहाँ केमरे शुटींग क्यों कर रहे थे” उसने थोड़े सख़्त लहजे में पूछा। “ मैं और शुटींग ? जी नही मैंने तो केमरा ऑन भी नही किया एयरपोर्ट आने के बाद।” - मैंने लगभग चौंकते हूए जवाब दिया।

“मगर आप केमरा लेकर उधर कोने में क्यों गये थे?” - उसने #सिक्योरिटी रूम कि तरफ इशारा करते हूए कहा। “जी मैं वॉशरूम गया था और केमरे को यहाँ सीट पर तो नही छोड सकता था सो अपने साथ ले गया था” मैंने अपना पक्ष रखते हूए कहा।

यह देखिये मेरे केमरे में लास्ट फोटो सुबह अस्सी घाट, बनारस की है उसके बाद मैंने इसे ऑन ही नही किया”- मैंने केमरे की स्क्रीन पर तस्वीरें दिखाते हूए अपना पक्ष मजबूत किया।

“आप पहले  विस्तारा और फिर इंडिगो वाले काउंटर पर क्यों गये थे? “ - उसने मेरा कैमरा हाथ में लेते हूए पूछा। “ मेरे क्लाइंट्स की टिकट विस्तारा से बुक थी सो मैं पहले उनके साथ वहाँ खड़ा था और उनके जाने के बाद मैं अपना बोर्डिंग पास बनवाने के लिये इंडिगो के काउंटर पर गया था।” - मामले की गंभीरता को समझते हूए मैने नपे तुले शब्दों में जवाब देना उचित समझा।इंडिगो वाले काउंटर पर क्यों गये थे? “ - उसने मेरा कैमरा हाथ में लेते हूए पूछा। “ मेरे क्लाइंट्स की टिकट विस्तारा से बुक थी सो मैं पहले उनके साथ वहाँ खड़ा था और उनके जाने के बाद मैं अपना बोर्डिंग पास बनवाने के लिये इंडिगो के काउंटर पर गया था।” - मामले की गंभीरता को समझते हूए मैने नपे तुले शब्दों में जवाब देना उचित समझा।

“ठिक है” - कहते हूए दोनों ऑफ़िसर्स ने एक-दूसरे की तरफ देखा और जवाबों से संतुष्ट होने के क्रम में सर हिलाया। उनकी संतुष्ट निगाहें देखकर मैं भी अब सहज होने लगा था।

“वैसे मैं यहाँ साढे छह बजे तक हूँ और अभी मेरा लगेज भी खुला हूआ है यदि आप को कोई अन्य जाँच भी करनी हो तो कर सकते हैं” मैंने सकारात्मक लहजे मैं ऑफ़िसर से अपना केमरा वापस लेते हूए कहा।

“नही सब ठिक है, एन्ट्री गेट पर टिकट चेक करने वाली लड़की ने इंफार्म किया था की आपकी फ़्लाइट साढ़े छह बजे है और साढ़े बारह बजे ही एयरपोर्ट पर आ गये जो की थोड़ा संदेहास्पद था, फिर आपके हाथ का केमरा, यहाँ वहाँ काउंटर पर जाना, दिल्ली की टिकट लेकर शारजाह वालों की लाइन में बैठना इतना कुछ काफ़ी है किसी पर शक करने के लिये”- पहले ऑफ़िसर ने अपनी जाँच को जायज़ दिखाते हूए कारण बताये।

“सही कहा आपने, वैसे भी नेशन फर्स्ट “ मैंने सुरक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली से सहमत होते हूए कहा।

“वैसे मैं अभी कुछ और घंटे हूँ यहाँ” मैंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हूए कहा। “ नही सब कुछ ठिक है” - कहते हूए वो ऑफ़िसर्स वापस लोट गये।

अभी कुछ बीस मिनट ही गुज़रे होंगे की आठ-दस सशस्त्र सुरक्षाकर्मी मेरी तरफ बढ़े। बडी मुश्किल से साँतत में आयी जान फिर से हलक में जा अटकी। “अब क्या कर दिया मैंने?” मैंने खुद से सवाल करते हूए कहा।

सुरक्षाकर्मी मेरे क़रीब से होते हूए शारजाह वाली फ़्लाइट के सुरक्षा जाँच वाले काउंटर पर चले गये पर मेरी सांसे थी की अभी भी हलक में अटकी हूई थी। मैं वहाँ से हट जाना चाहता था पर फिर एक बार सीट बदल कर दूबारा ऑबजर्वेशन पर नही आना चाहता था सो वहाँ बैठे रहने मैं ही भलाई समझी।

आज मेरे सहज मन को किसी आतंकी सा होने का अहसास हो रहा था। निर्अपराध होने पर भी एक अजीब सा अपराधबोध मन को बार बार कचोट रहा था। एक अजीब सा संघर्ष था जो मन ही मन चले जा रहा था।

ख़ैर चार बज चुके थे और मेरी फ़्लाइट के लिये चेक इन काउंटर खुल चूका था। मैंने अपना लगेज चेक इन किया और मैं सुरक्षा जाँच वाले काउंटर की तरफ बढ़ गया। जहाँ एक लोंग बूट पहने व्यक्ति के अलावा मुझे भी जूते उतार कर सुरक्षा जाँच करवानी पड़ी जोकी मेरे साथ पहली बार हूई थी।

मैं सुरक्षा जाँच के बाद अपने डिपार्चर गेट पर आ तो गया था पर मेरे मन में अभी भी कई सवाल मचल रहे थे कि क्या होता अगर मेरे केमरे में कोई एयरपोर्ट की तस्वीर मिल जाती? क्या उस छोटी सी बात के लिये मुझे किसी संदेहास्पद_अपराधी कि श्रेणी में डाल दिया जाता? क्या और भी कोई कारण था जो मुझे घंटों तक सर्विलिअंस ऑबजर्वेशन पर रखा गया? और भी ना जाने क्या क्या मचल रहा था ज़हन में।

यह वो कश्मकश थी जो शायद किसी भी मजबूत और सहज व्यक्तित्व वाले इंसान को हिला कर रख दे, पर मैं स्वभाव घुमक्कड़ और संयमित सोच वाला रहा हूँ जीवन में कई उतार चढ़ाव भी देखे है सो इस घटनाक्रम को सिर्फ एक घटना मान कर मुस्कुराते हूए आगे बढ़ गया।

मेरे विचारों के साथ साथ मेरा जहाज़ भी आसमान में पहूँच चूका था पर शायद आज के विचारों की उड़ान इस हवाई जहाज़ से कहीं ज्यादा उँची थी।

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