इतिहास ए यदुवंश (मंडरायल )

इतिहास ए यदुवंश (मंडरायल )


महाराजा अर्जुनबली

maharaja arjun dev

महाराज अर्जुनबली का राजतिलक अंधेर कटोला में सन् 1327 में हुआ था । राजतिलक के बाद यह करौली क्षेत्र को पुनः हस्तगत करने के इरादे से रीवा से चले थे । इन्होंने करौली क्षेत्र में सबसे पहले नीदर की गढ़ी का निर्माण करवाया था ,उसके बाद मौका पाकर मंडरायल दुर्ग पर कब्ज़ा कर लिया और वहां के किलेदार मियां मकन को हरा दिया ।

इस प्रकार महाराज अर्जुनबली(अर्जुनदेव)ने सन् 1327 में मण्डरायल पर विजय प्राप्त करके यदुवंशी राज्य को करौली क्षेत्र में पुनः स्थापित किया था।

यवन बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक के आमन्त्रण पर कुछ यदुवंशी राजपूतो को लेकर दिल्ली गए और वहां यवन पहलवान को परास्त किया एवम् वहां उपस्थित सभी को अपने बाहुबल से प्रभावित करके देव बहादुर का ख़िताब लिया साथ ही मुस्लिम बादशाह की बेटी का डोला प्राप्त कर हिन्दू संस्कृति के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा ।

मंडरायल जीतने के बाद महाराज अर्जुनबली ने पवार राजपूतो से मित्रता करके शासन क्षेत्र को बढ़ाया ।

उंटगिरि दुर्ग को लोधी राजपूतो से छीन कर सन् 1340 में अपने राज्य में मिलाया था ।

सन् 1348 में नये शहर करौली की नींव रखी और अपनी कुलदेवी माँ अंजनी का मंदिर बनवाया । सरमथुरा में 24 गाँव आबाद किये ।

इनकी चार शादिया हुई जिनसे दो पुत्र हुए

विक्रमाजीत :- गद्दी के वारिस ।

टोड़ूमल :- यह लाऔलद गए ।

महाराज विक्रमाजीत

maharaja vikramjeet

विक्रमाजीत अर्जुनबली(अर्जुनदेवजी) के बाद इनके पुत्र विक्रमाजीत गद्दी पर सन् 1361 में विराजे । इन्होंने अपने पिता के कार्य को आगे बढ़ाया और तिमनगढ़ व बयाना को जीत कर अपने राज्य में मिलाया ।

नई राजधानी पर कोई विशेष कार्य नही हुआ था इनके समय में ।

इनके 5 पुत्र हुए

अभय चंद्र :- गद्दी के वारिस ।

अजयचंद्र :- यह लाऔलद गए ।

मदनचंद्र :- यह लाऔलद गए ।

हरेकचन्द :- यह लाऔलद गए ।

किरपाल :- यह लाऔलद गए ।

महाराजा अभय चंद्र

maharaja abhay chand

महाराजा अभय चंद्र महाराजा विक्रमाजीत के बाद इनके पुत्र अभय चंद्र गद्दी पर सन् 1382 में विराजे थे।

उस समय दिल्ली पर फिरोजशाह तुगलक का शासन था ।

इनके समय में ही भारत पर तैमूरलंग का आक्रमण हुआ था ।

इनका शासनकाल शांतिपूर्ण रहा ।

इनके 5 पुत्र थे |

पृथ्वीपाल :- गद्दी के वारिस हुए ।

औजू :- औलाद स्रेरीवाजादो कहलाई ।

सौजु :- औलाद दादू के जाट कहलाई ।

रायभास :- लाऔलाद गए ।

माधोसिंह :- औलाद चौड़िया जादौन कहलाई ।

महाराजा पृथ्वी पाल

maharaja prithivipal

महाराजा पृथ्वी पाल महाराज अभय चंद्र के बाद इनके पुत्र पृथ्वी पाल सन् 1403 में मंडरायल की गद्दी पर विराजे ।

इन्होंने ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर को हरा कर ग्वालियर पर कब्जा कर लिया था ।

जिसे बाद में अपने मित्र चित्तोड़ के महाराणा कुंभा के कहने पर माच्छलपुर(मासलपुर) का परगना लेकर बाकि का ग्वालियर राजा मान सिंह को वापस करके मित्रता का परिचय दिया ।

इनके 13 पुत्र थे|

उदयचंद :- गद्दी के वारिस हुए ।

लक्षमनचंद :- औलाद खींचरे जादौ कहलाई ।

हमीरपाल :- औलाद मैमोरिया जादौ कहलाई ।

हरकदेव :- औलाद मैमोरिया जादौ कहलाई ।

अचराजदास :- औलाद लोवानिया जादौ कहलाई ।

हिंगलदेव :- औलाद मैचनोठिया जादौ कहलाई ।

माणकचंद :- औलाद मसदूर जादौ कहलाई ।

गोमकरण :- औलाद भाषावत जादौन कहलाई ।

ओबुजी :- लाऔलाद गए ।

सकंदरजी :- लाऔलाद गए ।

जमोंनिमान :- लाऔलाद गए ।

करकसिंह :- लाऔलाद गए ।

भावचंद :- लाऔलाद गए ।

महाराजा उदयचंद्र पृथ्वी पाल जी

maharaja uday chandra

महाराजा उदयचंद्र पृथ्वी पाल जी के बाद इनके पुत्र उदयचंद्र सन् 1433 में गद्दी पर विराजे । इनके शासन काल में आगरा के सिकंदर लोधी ने मंडरायल पर हमला करके इन्हें पराजित कर दिया था ।

इस कारण इन्होंने उंटगिरि में शरण लेनी पड़ी और वही से शासन चलाया इनके 4 पुत्र थे |

प्रतापरूद्र :- गद्दी के वारिस हुए ।

सख्यान :- ------

देवसेन :- -------

मसालजी :-------

महाराजा प्रतापरुद्र

maharaja prataprudra

महाराजा प्रतापरुद्र महाराजा उदयचंद्र जी के बाद इनके पुत्र प्रतापरुद्र जी गद्दी पर सन 1494 में विराजे ।

इनका शासन शांतिपूर्ण रहा इनके 4 पुत्र हुए

देवरूप जी :- कुंवर पदवी पर गुजरे ।

चन्द्रसेन :- गद्दी के वारिस हुए ।

सुंदाराय :- औलाद महय के जादौन कहलाए ।

अभैपाल :- धस जादौन कहलाए ।

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