श्री मेंहदीपुर बालाजी

श्री मेंहदीपुर बालाजी


राजस्थान राज्य के दो जिलों में विभक्त मेंहदीपुर स्थान बड़ी लाइन के बाँदीकुई स्टेशन से जो कि दिल्ली, जयपुर, अजमेर, अहमदाबाद लाइन पर है, 24 मील की दूरी पर स्थित है। इसी प्रकार बड़ी लाइन के हिंडोन स्टेशन से भी यहाँ के लिए बसें मिलती हैं। अब तो आगरा, मथुरा , वृंदावन , अलीगढ़ आदि से सीधी बसें जो जयपुर जाती हैं बालाजी के मोड़ पर रूकती हैं।

फ्रंटीयर मेल से श्री महावीर जी स्टेशन पर उतर कर भी हिंडोन होकर बस द्वारा बालाजी पहुँचा जा सकता है। हिंडोन सिटी स्टेशन पश्चिम रेलवे की बड़ी लाइन पर बयाना और महावीर जी स्टेशन के बीच दिल्ली, मथुरा, कोटा, रतलाम, बड़ोदरा, मुंबई लाइन पर स्थित है। हिंडोन से सवा घण्टे का समय श्री मेंहदीपुर बालाजी तक बस द्वारा लगता है। यह स्थान दो पहाड़ियों के बीच बसा हुआ बहुत आकर्षक दिखाई पड़ता है। यहाँ की शुद्ध जलवायु और पवित्र वातावरण मन को बहुत आनंद प्रदान करता है। यहाँ नगर-जीवन की रचनाएँ भी देखने को मिलेंगी।

श्री मेंहदीपुर बालाजी की प्रकट होने की धारणा यहाँ तीन देवों की प्रधानता है— श्री बालाजी महाराज, श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल (भैरव)। यह तीन देव यहाँ आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे। इनके प्रकट होने से लेकर अब तक बारह महंत इस स्थान पर सेवा-पूजा कर चुके हैं और अब तक इस स्थान के दो महंत इस समय भी विद्यमान हैं। सर्व श्री गणेशपुरी जी महाराज (भूतपूर्व सेवक) श्री किशोरपुरी जी महाराज (वर्तमान सेवक)।

यहाँ के उत्थान का युग श्री गणेशपुरी जी महाराज के समय से प्रारम्भ हुआ और अब दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जारहा है। प्रधान मंदिर का निर्माण इन्हीं के समय में हुआ। सभी धर्मशालाएँ इन्हीं के समय में बनीं। इस प्रकार इनका सेवाकाल श्री बालाजी घाटा मेंहदीपुर के इतिहास का स्वर्ण युग कहलाएगा। प्रारम्भ में यहाँ घोर बीहड़ जंगल था। घनी झाड़ियों में चीते, बघेरा आदि जंगली जानवर पड़े रहते थे। चोर-डाकुओं का भी भय था। श्री महंतजी महाराज के पूर्वजों को जिनका नाम अज्ञात है, स्वप्न हुआ और स्वप्न की अवस्था में ही वे उठ कर चल दिये।

उन्हें पता नहीं था कि वे कहाँ जा रहे हैं और इसी अवस्था में उन्होंने एक बड़ी विचित्र लीला देखी। एक ओर से हजारों दीपक चलते आ रहे हैं। हाथी-घोड़ों की आवाजें आ रही हैं और एक बहुत बड़ी फौज चली आ रही है। उस फौज ने श्री बालाजी महाराज की मूर्त्ति की तीन प्रदक्षिणाएँ कींऔर फौज के प्रधान ने नीचे उतरकर श्री महाराज की मूर्त्ति को साष्टांग प्रणाम किया तथा जिस रास्ते से वे आये थे, उसी रास्ते से चले गये। गोसाँई जी महाराज चकित होकर यह सब देख रहे थे। उन्हें कुछ डर-सा लगा और वे वापस अपने गाँव चले गये, किन्तु नींद नहीं आयी और बार-बार उसी पर विचार करते हुए उनकी जैसे ही आँखें लगी उन्हें स्वप्न में तीन मूर्त्तियाँ, उनके मन्दिर और विशाल वैभव दिखाई पड़ा और उनके कानों में यह आवाज आयी - उठो, मेरी सेवा का भार ग्रहण करों। मैं अपनी लीलाओं का विस्तार करूँगा। यह बात कौन कह रहाथा, कोई दिखाई नहीं पड़ा। गोसाँई जी ने एक बार भी इस पर ध्यान नहीं दिया। अन्त में श्री हनुमान जी महाराज ने इस बार स्वयं उन्हें दर्शन दिये और उन्हें पूजा करने का आदेश दिया। दूसरे दिन गोसाँई जी महाराज उस मूर्त्ति के पास पहुँचे तो उन्होंने देखा कि चारों ओर से घंटा-घड़ियाल की आवाज आ रही है, किन्तु दिखाई कुछ नहीं दिया। इसके बाद श्री गोसाँई जी ने आस-पास के लोग इकट्ठे किये और उन्हें सारी बातें बतायी।

उन लोगों ने मिलकर श्री महाराज की एक छोटी-सी तिवारी बना दी और यदा-कदा भोग प्रसाद की व्यवस्था कर दी। कई एक चमत्कार भी श्री महाराज ने दिखाये, किंतु यह बढ़ती हुई कला कुछ विधर्मियों के शासन-काल में फिर से लुप्त हो गयी। किसी ने श्री महाराज की मूर्त्ति को खोदने का प्रयत्न किया। सैंकड़ों हाथ खोद लेने पर भी जब मूर्त्ति के चरणों का अन्त नहीं आया तो वह हार-मानकर चला गया। वास्तव में इस मूर्त्ति को अलग से किसी कलाकार ने गढ़ कर नहीं बनाया है, अपितु यह तो पर्वत का ही अंग है और यह समूचा पर्वत ही मानों उसका 'कनक भूधराकार' शरीर है। इसी मूर्त्ति के चरणों में एक छोटी-सी कुण्डी थी, जिसका जल कभी बीतता ही नहीं था। रहस्य यह है कि महाराज की बायीं ओर छाती के नीचे से एक बारीक जलधारा निरन्तर बहती रहती है जो पर्याप्त चोला चढ़ जाने पर भी बंद नहीं होती। इस प्रकार तीनों देवों की स्थापना हुई। विक्रमी-सम्वत् 1979 में श्री महाराज ने अपना चोला बदला। उतारे हुए चोले को गाड़ियों में भरकर श्री गंगा में प्रवाहित करने हेतु बहुत से श्रद्धालु चल दिये। चोले को लेकर जब मंडावर रेलवे स्टेशन पर पहुँचे तो रेलवे अधिकारियों ने चोले को सामान समझकर सामान-शुल्क लेने के लिए उस चोले को तौलना चाहा, किन्तु वे तौलने में असमर्थ रहे। चोला तौलने के क्रम में वजन कभी एक मन बढ़ जाता तो कभी एक मन घट जाता; अन्तत: रेलवे अधिकारी ने हार मान लिया और चोले को सम्मान सहित गंगा जी को समर्पित कर दिया गया। उस समय हवन, ब्राह्मण भोजन एवं धर्म ग्रन्थों का पठन आदि कार्य हुए और नये चोले में एक नयी ज्योति उत्पन्न हुई, जिसने भारत के कोने-कोने में प्रकाश फैला दिया  |

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