गोपाल जी कच्छवाहा ।।

गोपाल जी कच्छवाहा ।।


वि, स, 1584-1621, शेरशाह सूरी को चाकसू के समीप परास्त करने वाले आमेर के आठवें शासक परम पूजनीय पुर्वज पृथ्वीराज जी आमेर के पुत्र गोपाल जी कच्छवाहा।।- (1593) सूर्यवंशी क्षत्रिय वंशज- कच्छवाहा- कुल आमेर शासक महाराजा पृथ्वीराज सिंह जी कच्छवाहा के पुत्र गोपाल जी कच्छवाहा ओर नाथाजी नाथावत कच्छवाहा कुल के जन्मदाता। भक्ति भाव ,दयालु ,निष्ठावान, धर्मपरायण, स्वाभिमान जिनमें शामिल है। वह थे। परम पूजनीय पुर्वज बाबोसा हूक्म सामोद महाराज गोपाल जी कच्छवाहा। प्रारंभिक युग से ही ढुढाड़ का कच्छवाहा वंश इतिहास अत्यंत गौरवशाली माना जाता है। राजपूताना के लिए अपितु अखंड भारत के सनातन धर्म की रक्षा के लिए हमेशा कटिबंध रहा है। इस वंश का शौर्य, साहस ,पराक्रम, धैर्य, दृढ़ता, निष्ठा, न्याय, चातुर्य बल वीरता, स्वातंत्रय प्रेम तथा स्वदेश स्वाभिमान अपनी चरमोत्कृष्टता पर पहुंच गया था। आज हम कच्छवाहा वंश के ऐसे वीर अपितु वीरों के वीर बाहुबल के प्रतिनिधि राजधिराज श्री, आमेर के सातवे महाराज चन्दसेन जी के पौत्र ओर पृथ्वी राज जी प्रथम आमेर के पुत्र गोपाल जी कच्छवाहा का स्वर्णिम गौरव इतिहास से आप सभी मित्रों को अवगत करवायेगें। जय राजपूताना ।। मां जमुवाय को नमनः करते हुऐ में आगे मेरे पूजनीय पुर्वज का आदरपूर्वक वर्णन करता हूँ। में मान प्रताप सिंह किल्याणोत ठि गढ़ धवान। इन्ही आमेर के आठवें महाराज पृथ्वीराज जी आमेर के वंशज कच्छवाहा कुल वीर कालवाड़ नरेश कल्याण सिहं जी (कल्याणदासजी)के वटवृक्ष कच्छवाहा किल्याणोत हूँ। हूक्म। आमेर महाराज पृथ्वीराज जी आमेर के पुत्रो में गोपालजी शान्ति प्रिय हरिभक्त न्यायप्रिय जनप्रियता के धनी थे। इनका जन्म बालाबाई कँवर की कोख से हुआ था। वह जन्मानुगत अपने माता पिता के भक्त तथा हरिप्रिय थे। गोपाल जी ने अपने कुँवर पद में ही अपनी विरता पराक्रम शोर्य का परिचय दे दिया था। शेखावतो के समर में विजयी हुऐ। पँवार ओर सोलकियों का मद दूर किया। निर्वाणो के पर अपनी जीत दर्ज की। ओर कर्मचन्द की कुटील गति सरल बनाई महाराजा पृथ्वीराज जी के परलोक पधारे पीछे,उनके अठारवें पुत्र पूरणमलजी (इनके वंशज पूरणमलौत कच्छवाहा वंशज कहलाते है) पहले पुत्र भीमजी (इनके वंशज भीमपौता कच्छवाहा कहलाते है) ओर तीसरे पुत्र भारमल जी यथा क्रम आमेर के महाराज हुए। ओर चौथा पुत्र गोपालजी को उसी वर्ष (1584) मैं सामोद मोहांणा मिला।गोपालजी की जागीर मोहांणा लगभग 1200 रू़ वार्षिक आय का ओर सामोद बारह गाव की जागीर मिली है। पृथ्वीराजजी के परलोक बासी पीछे 20-22 वर्ष तक राज्य की परिस्थिति अत्यधिक चिन्ताजनक थी। पिता के पीछे उनके बडे बेटे को सर्वाधिकार करने ओर वह न हो तो बैकुंठ वासी के छोटे भाई को राजा बनाने आदि की जो परंपरा की परिपाटी चली आ रही है। वह भी मिट गई। एक के पीछे दूसरे ओर दूसरे के पीछे तीसरे मनमाने राजा हो गये। इस दुरवस्था से भाई बेंटों मे आपस का कलह इतना बढ़े गया। की बेठें हुऐ राजा की भी हत्या कर देते थे। ओर राज्य की नियत सीमा को भी हडप जाते थे। 5 उस समय पूरणमलजी आदि कईयो न आमेर के सुवर्ण सिहासंन का सुखानुभव या सपर्श किया। ओर समय असमय परलोक सिधारें गये। या पद हीन हो गये। इस प्रकार की बढी हुई भीषण परिस्थिति के खोट परिणाम का विचार कर शांतिप्रिय गोपालजी ने भारमलजी की राज्य प्राप्ति में पुर्ण सहयोग व सहायता की। उसके पहिले वह पूरणमलजी आदि 5 राजाओ के छल कपटता, ईर्षा आपसी झगड़े अपहरण ओर ओछपन के प्रपंच देख चुके थे। ओर उनके निवारण के उपाय भी प्रस्तुत कर चुके थे। गोपालजी ने चाकसू के समीप सम्वत 1593 में शेरशाह सूरी को परास्त किया था ।। भारत भ्रमण आदि के खण्डसः आशय देखने से मालूम हो सकता है। कि शेरशाह सूरी उर्फ शेरखाँ हुँमायु को हराकर मालदैव को दबाने के लिए चाकसू के रास्ते से मारवाडी को घरने जा रहा था। रक्षाविधान में बाधा उत्पन्न की शंका तथा मालदैव जी को बचाने की कामना से गोपालजी ने वहा जाकर घरे लिया। मुसलमान ज्यादा थे। ओर राजपूत कम संख्या में थै। किंतु सब साहसी ओजस्विता से परिपूर्ण तथा शूरवीरता से भीभूषित थे। कदाचित् चाकसू में शेरखाँ उर्फ शेरशाह सूरी की गोपालजी से मुठभेड़ नहीं होती तो वह अवश्य ही मारवाड पहुंच कर मालदैव को ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता।। गोपाल जी केटकी की लडाई में लडते हुऐ काम आये। इनके तीन विवाह हुऐ। 1 -सत्यभामाजी (जादूणजी) 2-रूकमणीजी (चौहाणजी) 3- लाड़कुवरी (मडतणी राठौड जी) गोपाल जी के नौ पुत्र -1 नाथाजी इनके वंशज नाथावत कच्छवाहा वंशज कहलाते है।। 2 सुरजनसिहजी ।। 3 बाघाजी ।।इनको सिरसी बिन्दायंका की जागीर मिली है। इनके वंशज बाघावत कच्छवाहा वंशज कहलाते है।। 4- देवकरणजी इनको बीसलपुर ओर भासु की जागीर मिली है। इनके वंशज देवकणौत कच्छवाहा वंशज कहलाते है। 5-तैजसीजी।। 6- मैलसीजी।। 7- बैरीसालजी।। 8- गौरखदासजी।। 9-रघुनाथजी।। भगवान राम तक गोपालजी कच्छवाहा वंशज का पीढीं क्रम इस प्रकार है। - गोपालजी - प्रथ्वीराज सिँह (प्रिथीराज) - चन्द्रसेन - राव उधा जी (उदरावजी, उधरावजी) - बनवीर जी (वणवीर) - नाहरसिंहदेव जी - उदयकरण जी - जुणसी जी (जुणसी, जानसी, जुणसीदेव जी, जसीदेव) - जी - कुन्तलदेव जी – किलहन देवजी (कील्हणदेव,खिलन्देव) - राज देवजी - राव बयालजी (बालोजी) - मलैसी देव - पुजना देव (पाजून, पज्जूणा) – जान्ददेव - हुन देव - कांकल देव - दुलहराय जी (ढोलाराय) - सोढ देव (सोरा सिंह) - इश्वरदास (ईशदेव)-सुमित्र -मंगलराज-ब्रजधामा-भानु- लक्ष्मण -ढोलाजी -राजा नलजी- वीरसैन - अथिति - कुश (इनके वंशज कुशवाह, कचछावाँ, कच्छवाहा वंशज कहलाते है) भगवान श्रीराम जी।। जय जमुवाय।। जय बढ़वाय।। जय गऊ माता।। मान प्रताप सिंह किल्याणोत ठि गढ़ धवान
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