6 खानजादे मुस्लिम राजपूत

6 खानजादे मुस्लिम राजपूत


।।जय रघुनाथ जी री।।

आज हम ऐसे कछवाहा छः राजपूत सरदारो जिन्हें इतिहास से अछुता रखा गया था! कारण शिकार करतें हुऐ! धोखे से गऊ की हत्या हो जानें के कारण पश्चाताप मे गंगा में स्नान भी करने निकल पडे!

पर मन मे पश्चाताप इतना बड़ा था कि उन्हें अपना स्वयं धर्म त्याग कर मजबूरन यदुवंशी यादव जादौ राजा हँसन खाँ मेवाती जो कि राजपूत जादौवंशी अपितु (यादववंशी ) जो कि ऐसी ही विपरीत परिस्थिति में इस्लाम कबूल कर बैठ थे!
इन सभी का इस्लाम धर्म अपनाना विपरीत परिस्थितियों का कारण था! भले ही इन्होंने धर्म बदला लेकिन अपना क्षात्रधर्म पर सदैव गर्व ओर गोरावंतित रहे! ओर समय समय अनुसार इस मातृभूमि की रक्षार्थ अडिग रहें!

खानजादे पीढी क्रम__इस प्रकार है -: -कुन्तलदेव जी – किलहंणदेवजी__राज देवजी - राव बयालजी (राव बयालदेव जी, बालोजी) - मलैसी देव - पुजवनदेव (पाजून, पज्जूणा) – जान्ददेव - हुन देव - कांकल देव - दुलहराय जी (ढोलाराय) - सोढ देव (सोरा सिंह) - इश्वरदास (ईशदेव जी) आमेर महाराज कुन्तलदेव जी के सबसे बड़ा पुत्र हम्मीरदेवजी थें जिनके वंशज हम्मीरदेवका कछवाहा कहलाते है! इन्हीं के छोटे भाई ओर आमेर के महाराज कुन्तलदेव जी के छः पुत्रों से धोखे मे रहकर गाय की हत्या हो गई थी! ओर पश्चाताप मे अपना राज्य माता पिता भाई बंधु सब कुछ त्यागकर आमेर से निकल पड़े! ओर आगे चलकर छः खानजादे नाम से जाने गये!!

अलवर जिले के इदौर नामक स्थान पर मेवात के खानजादे बयाना के शासक टिहूणपाल यादव जो की जादौवंशी राजपूत है! इनके मेवात क्षैत्र मे छोटे बडे क ई ठिकाने है। यह बहुत ही बहादुर साहसी निडर कौमें है।

वहीं राजपूतों की भाति मातृभूमि से लगाव स्वाभिमानी, निडर , व वचन के सच्चे होते हैं! ओर अपने क्षत्रिय होने पर बडा ही गर्व करते है! भले ही धर्म इन्होंने विपरीत परिस्थितियों में बदला हो! अपनी स्वच्छता से इस्लाम कबूला था , नाकि किसी भय से बंधकर ! इन्हें अपने रक्त पर गर्व है! इसलिए ही तो यह अपनी मातृभूमि से लगाव रखते हैं! खानजादो को अपने रजपूती रक्त पर सदैव अभिमान रहा है! हँसन खाँ मेवाती जो कि खानवा के युध्द मे बाबर से युध्द करने वाला था!! ओर छः कछवाहा खानजादे बलभद्रदेव, राजोदेव, गोपालदेव, भोजराज, बाघोराज, व मलहण देव, !!

जो कि शिकार करने गये! धोखे से इनके हाथों एक निर्बल गाय की हत्या हो गई थी! पश्चाताप की आग मे इतने व्याकुल हो उठ कि अन्न जल , यहां तक की अपना राज्य त्यागकर सब कुछ छोड गंगा स्नान को चल पडे!

रास्ते में जाते वक्त इदौर नामक स्थान पर इन्हे रोका ओर समझाया कि भले ही आप गंगा स्नान कर के आ जाऐ आप राजपूत खमे मे दोबारा शामिल नहीं हो सकते है! हम भी विपरीत परिस्थितियों में इस्लाम कबूल कर बैठे हैं! मगर अपना राजपूत धर्म हम नहीं भूल है , ओर ना ही हमारी पीढियां !! हम निरंतर इस मातृभूमि के रक्षक थे ओर रहगें आप हमारे साथ बन रहे ! ओर समय समय अनुसार हम अपना क्षत्रिय धर्म निभाऐगे! ओर इस मातृभूमि की सदैव रक्षार्थ बन रहगें!!

इसी प्रकार इन छः कछवाहा राजपूतों ने उन यदुवंशी खानजादो की छः पुत्रियों से शादी कर ली थी जो की तिमनगढ़ के राजा महाराजा तिमन पाल जी यादव (जादौनवंशी) के वंशज थे! ओर स्वच्छता से इस्लाम कबूल कर लिया था!! आज भले ही यह छः कछवाहा राजपूत खानजादे इस संसार में नहीं है! ओर ना ही जादोवंशी हसन खाँ मेवाती लेकिन आज भी इनका इतिहास विरता शौर्यगाथा ओर निडर साहसी कार्य को बँया करता है!

राजपूत भले ही अन्य धर्म मे विपरीत परिस्थितियों में जुडे गया हो लेकिन अपनी मातृभूमि, आन बान, शान, ओर स्वाभिमान को आज भी जिन्दा रख कर बैठा है! ओर जन्मजन्मांतर तक इसी प्रकार अपनी जुबां पर अडिगं रहेगा!!

जुबां देते हैं जिसको भी, निभा देते हैं मेवाती, जो कहते हैं वही करके, दिखा देते हैं मेवाती। ये साबित हो चुका है, वतन पर जां लडा देते हैं मेवाती, बडों के हुक्म पर, गर्दन कटा देते हैं मेवाती।

दुर्भाग्य से #राजपूत कभी भी कैसी भी स्थिति मे हो तब भी उसके उसूल नहीं बदलते और जो बदलने की कोशिश करते है उनका शारीरीक भूगोल अवश्य बदल जाता है। हा राजपूत भलें ही अन्य धर्म अपना लेवे पर राजपूत अपना स्वयं धर्म कभी नहीं भूलता है। आप सभी लगभग हसन खाँ मेवाती से रूबरू होगें! जिन्होंने खानवा के युध्द मे राणा सांगा के साथ सन् 1528 में जब बाबर भारत की जमीन पर इस्लाम का परचम बुलंद किए सनातन सभ्यता को पूर्णतः नेस्तनाबूद करने के लिए खडा था तब उसे रोकने के लिए हमेशा की तरह राजपूत पहाड बनकर खडे थे।

वो पहाड जिसको पार कर ही सनातन संस्कृति को नष्ट किया जा सकता था परंतु बाबर से पहले न जाने कितने विधर्मी अपने अपने धर्म का झंडा लेकर आए और हमेशा इसी आस मे कि वे एक न एक दिन इस राजपूत रुपी पहाड पर अपने मजहबों का परचम अवश्य लहराएंगे। परंतु ये भी राजपूत की छाती है, इसे पत्थर की धरती समझने की भूल मत करना। वो राजपूत की छाती ही क्या जो नुकीले शस्त्रों की मार से किसी भी ध्वज को लहराने मे मददगार बन जाए।

बाबर को यदि हिंदुस्तान मे सल्तनत बनानी थी तो उसे मेवाड़ के शासक राणा सांगा को परास्त करना पडेगा जो मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी था। अनेकों राजपूत सरदार उनके साथ रणभूमि मे खडे शत्रु के इंतजार मे अपनी मूँछो पर ताव दे रहे थे। इसी बीच उसे खबर मिलती है कि मेवात के शासक राजा हसन खाँ के बारे मे खबर लगती है। हसन खाँ की शूरवीरता के किस्सै हिंदुस्तान मे दूर दूर तक प्रसिद्ध थे। जब ये किस्सै बाबर को पता लगे तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा, उसे लगा हसन खाँ भी मुसलमान और मै भी, यदि वो मेरे साथ आ गया तो फिर उसकी विजय सुनिश्चित।

इसी आशा मे वो हसन खाँ के पास एक पत्र भिजवाता है जिसमें वो लिखता है कि - “बाबर भी कलमा-गो है और हसन खान मेवाती भी कलमा-गो है, इस प्रकार एक कलमा-गो दूसरे कलमा-गो का भाई है इसलिए राजा हसन खान मेवाती को चाहिए की बाबर का साथ दे!” इस पत्र के जवाब मे हसन खाँ मेवाती एक पत्र बाबर को भिजवाते है जिसमें लिखा था कि - “बेशक़ हसन खान मेवाती कलमा-गो है और बाबर भी कलमा-गो है, मग़र मेरे लिए मेरा मुल्क(भारत) पहले है और यही मेरा ईमान है इसलिए हसन खान मेवाती राणा सांगा के साथ मिलकर बाबर के विरुद्ध युद्ध करेगा!”

जी हाँ! मेवात के वीर शासक राजा हसन खाँ मेवाती जो कि महाराजा समरपाल की पाँचवी पीढी मे थे। ये करौली यदुवंशी जादौन महाराज के वंशज थे। राजा हसन खाँ मेवाती का खानदान 200 वर्षों से भी अधिक समय से मेवात पर शासन कर रहे थे। उनकी राजधानी अलवर थी। ये 1506 मे मेवात के राजा बने। जो कि एक मुस्लिम राजपूत थे तथा उनका गोत्र भी जादू था। उन्होंने बाबर को चेताया कि राणा साँगा मेरा भाई है और फिर भी यदि वो युद्ध का निर्णय करता है तो मेवाती तलवारें बेसब्री से तेरे इंतजार मे है।

लेखन कुँ०मानप्रताप सिहं किल्याणोत ठिकाना गढ़धवान सहयोगी बढ़वा जी श्रीमान शंकर सिहं जी जैसावत ठि.. बढ़वाजी का वास.... जय #क्षात्रधर्म
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