चुकंदर (कृषि ज्ञान )

चुकंदर (कृषि ज्ञान )


चुकंदर चुकंदर एक मूसला जड़ वाला वनस्पति है। यह बीटा वल्गैरिस नामक जाति के पौधे होते हैं जिन्हें मनुष्यों ने शताब्दियों से कृषि में पाला है और कई नस्लों में विकसित करा है। इसकी मूसला जड़ अक्सर हलकी-मीठी होती है और उसका रंग लाल, जामुनी, पीला या श्वेत होता है। विश्व के कई स्थानों में चुकंदर की जामुनी जड़ को कच्चा, उबालकर या भूनकर खाया जाता है। इसे अकेले या अन्य सब्ज़ी के साथ खाया जा सकता है, और इसका अचार भी डाला जाता है। भारतीय खाने में इसे महीन काटकर और हलका-सा पकाकर मुख्य खाने के साथ खाया जाता है। चुकंदर के पत्तों को भी खाया जाता है, इनका प्रयोग आहार में कच्चा, उबालकर या भाप-देकर होता है।चुकंदर लोहा, विटामिन और मिनरलस का बहुत ही अच्छा श्रोत है इसीलिए चुकंदर का औषधीय उपयोग अधिक किया जाता है| चुकन्दर की खेती :- चुकन्दर चिनिपोडिएसी कुल का शक़्कर उत्पादन करने वाला पौधा हैं। चुकन्दर छोटे जोट क्षेत्रों के लिए कम लागत में अधिक पैदावार देने वाली महत्वपूर्ण फसल हैं. यह लवणीय भूमि जिसकी पि.एच. मान 9.5 हो उसमे भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। चुकन्दर (beetroot farming) को सब्जी एवं सलाद के रूप में काम में लिया जाता हैं। चुकन्दर की अच्छी फसल के लिए लगभग 5-10 टन/हैक. हरी पत्तियां मिलती हैं, जिनमे 10% प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्व होते हैं। इनको गर्मियों में पशु आहार के रूप में प्रयोग किया जा सकता हैं। चुकन्दर की पत्तियों में नत्रजन की काफी मात्रा होती हैं अतः इन्हे हरी खाद के रूप में भी डाला जा सकता हैं। अच्छी फसल से प्राप्त पत्तियों से अनुमानतः 100 की.ग्रा. नत्रजन भूमि में मिल जाती हैं। चुकंदर से चीनी निकालने के पश्चात् बचे भाग को भी पशुओं को विभिन्न रूप में साइलेज बनाकर सुखाकर या ताजे रूप में दिया जाता हैं। इसके अतिरिक्त चुकंदर का शिरा पशुओं को खिलाने के साथ-साथ एल्कॉहल बनाने के काम भी आता हैं। जलवायु एवं मृदा:- चुकंदर को सभी प्रकार की जलवायु में सुगमता से उगाया जा सकता हैं। यह तापक्रम अप्रभावी व वायु से कम सहिष्णु होती हैं, इसे पूर्ण प्रकाशकाल की आवश्यकता रहती हैं। कम जल में खेती की जा सकती हैं। 20-22 डिग्री सेंटीग्रेट ताप पर चुकंदर की अच्छी उपज ली जा सकती हैं। ठन्डे मौसम से इसमें उच्च शर्करा निर्माण एवं जड़ों के अंदर गहरा लाल रंग पैदा हो जाता हैं। बुवाई का उचित समय अक्टुम्बर से नवम्बर होता हैं। बलुई दोमट व दोमट मृदा, अच्छी जल निकासी वाली मृदा उपयुक्त रहती हैं। इसे क्षारीय मृदा में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता हैं। चुकन्दर के खेत की तैयारी:- प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के पश्चात एक बार हेरो चलाकर कल्टीवेटर से क्रॉस में जुताई करनी चाहिए एवं अंत में पाटा चलाकर खेत को समतल कर देना चाहिए। खेत की जुताई के समय उसमे पर्याप्त नमी होनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक प्रबंधन:- अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद की 25 टन/हैक. की मात्रा खेत की तैयारी के वक्त मिला दी जानी चाहिए। 120 की.ग्रा. नत्रजन जिसे तीन चरणों में 1/3 बुवाई के समय, 1/3 पौध छटाई के वक्त, शेष बुवाई के 3-4 माह पश्चात् फास्फोरस 60 तथा पोटाश 40 की.ग्रा. देनी चाहिए बोरोन की सूक्ष्म मात्रा में आवश्यकता रहती हैं। इसके लिए आवश्यकता होने पर बॉरोक्स 11 की.ग्रा./हैक. दिया जा सकता हैं। चुकंदर में सिंचाई:- सिंचाई के लिए सुनिश्चित अंतराल निर्धारित नहीं हैं, किन्तु 6-7 सिंचाइयाँ लाभप्रद रहती हैं। प्रथम दो सिंचाइयाँ 15-20 दिन के अंतराल पर एवं बाद में फसल कटाई तक 20-25 दिन के अंतराल पर दी जानी चाहिए। :- आशीष पाल करौली (करौली सब्जी बाजार )
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