आलू (कृषि ज्ञान )

आलू (कृषि ज्ञान )


आलू एक सब्जी है। वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से यह एक तना है। इसका उद्गम स्थान भारत में ठण्डे पहाड़ी प्रदेश एवं दक्षिण अमेरिका का पेरू (संदर्भ) है। यह गेहूं, धान तथा मक्का के बाद सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है। भारत में यह विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में उगाया जाता है। यह जमीन के नीचे पैदा होता है। आलू के उत्पादन में चीन और रूस के बाद भारत तीसरे स्थान पर है।

 

कृषि :- आलू की फसल कम समय में किसानों को ज्यादा फायदा देती है, पर पुराने तरीके से खेती कर के किसान इस से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने से चूक जाते हैं । आलू किसानों की खास नकदी फसल है । अन्य फसलों की तुलना में आलू की खेती कर के कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है । अगर किसान आलू की परंपरागत तरीके से खेती को छोड़ कर वैज्ञानिक तरीके से खेती करें तो पैदावार और मुनाफे को कई गुना बढ़ाया जा सकता है । वैज्ञानिक तकनीक से आलू की खेती करने पर प्रति एकड़ 4-5 लाख रुपए की सालाना आमदनी हो सकती है । आलू की अगेती फसल सितंबर के आखिरी सप्ताह से ले कर अक्तूबर के दूसरे सप्ताह तक और मुख्य फसल अक्तूबर के तीसरे सप्ताह से ले कर जनवरी के पहले सप्ताह तक लगाई जा सकती है । इस की खेती के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी काफी मुफीद होती है । अप्रैल से जुलाई बीच मिट्टी पलट हल से 1 बार जुताई कर ली जाती है । उस के बाद बोआई के समय फिर से मिट्टी पलट हल से जुताई कर ली जाती है । उस के बाद 2 या 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद बोआई की जाती है ।

 

जल्दी तैयार होने वाली किस्में :- कुफरी अशोक, कुफरी पुखराज और कुफरी सूर्या आलू की उन्नत किस्में हैं और ये बहुत जल्दी तैयार हो जाती हैं । कुफरी अशोक के कंदों का रंग सफेद होता है और ये करीब 75 से 85 दिनों के भीतर पक कर तैयार हो जाती है । इस की उत्पादन कूवत 300 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है । कुफरी पुखराज प्रजाति के आलू के कंदों का रंग सफेद और गूदा पीला होता है । इस की फसल 70 से 80 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है । 1 हेक्टेयर खेत में 350 से 400 क्विंटल फसल पाई जा सकती है । कुफरी सूर्या किस्म के आलू का रंग सफेद होता है और यह किस्म 75 से 90 दिनों के भीतर पक कर तैयार हो जाती है । इस में प्रति हेक्टेयर करीब 300 क्विंटल की पैदावार होती है।

मध्यम समय में तैयार होने वाली किस्में :- कुफरी ज्योति, कुफरी अरुण, कुफरी लालिमा, कुफरी कंचन और कुफरी पुष्कर मध्यम अवधि में तैयार होने वाली आलू की किस्में हैं। कुफरी ज्योति 90 से 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है । इस आलू के कंद सफेद रंग के अंडाकार और उथली आंखों वाले होते हैं । 1 हेक्टेयर में करीब 300 क्विंटल फसल मिलती है । कुफरी अरुण के कंदों का रंग लाल होता है और यह पकने में 100 दिनों का समय लेती है । इस की उपज 350 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है । कुफरी लालिमा के कंदों का रंग लाल होता है और यह 90 से 100 दिनों में पक जाती है। 1 हेक्टेयर में 300 से 350 क्विंटल फसल मिल जाती है । कुफरी कंचन किस्म का रंग लाल होता है और यह 100 दिनों में पक जाती है ।इस से प्रति हेक्टेयर करीब 350 क्विंटल आलू पाया जा सकता है । कुफरी पुष्कर की आंखें गहरी और गूदे का रंग पीला होता है। इस किस्म की खेती से प्रति हेक्टेयर 350 से 400 क्विंटल आलू मिलता है।

 

देर से तैयार होने वाली किस्में :- कुफरी बादशाह और कुफरी सिंदूरी की फसलें तैयार होने में काफी ज्यादा समय लेती हैं । कुफरी बादशाह का रंग सफेद होता है और इस की फसल 110 से 120 दिनों में पकती है । इस की उपज 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। कुफरी सिंदूरी प्रजाति का रंग लाल होता है और यह भी पकने में 110 से 120 दिनों का समय लेती है ।

 

खाद और उर्वरक :- खेत की जुताई के वक्त खेत में अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद 15 से 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देनी चाहिए. रासायनिक खादों का इस्तेमाल जमीन की उर्वरा शक्ति, फसल चक्र और प्रजाति पर निर्भर होता है, इसलिए कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर इन का इस्तेमाल करें । आलू की बेहतर फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 150 से 180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 100 से 20 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है। फास्फोरस व पोटाश की पूरी और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई के वक्त ही खेत में डालनी होती है । बची हुई नाइट्रोजन को मिट्टी चढ़ाते समय खेत में डाला जाता है ।

 

ऐसे करें बुवाई :- कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि आलू की बुवाई करने से पहले बीज को कोल्ड स्टोरेज से निकाल कर 10-15 दिनों तक छायादार जगह में रखें । सड़े और अंकुरित नहीं हुए कंदों को अलग कर लें । खेत में उर्वरकों के इस्तेमाल के बाद ऊपरी सतह को खोद कर उस में बीज डालें और उस के ऊपर भुरभुरी मिट्टी डाल दें । लाइनों की दूरी 50-60 सेंटीमीटर होनी चाहिए, जबकि पौधों से पौधों की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए ।

 

आशीष पाल करौली

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