करौली (यदुवंश)का चमकौर (माँची का युद्ध )

करौली (यदुवंश)का चमकौर (माँची का युद्ध )


करौली (यदुवंश) का चमकौर (मांची की लड़ाई )  मांची ग्राम करौली रियासत का एक मुख्य ठिकाना था । जो हरिदासी जादौनों के अधिकार में था । इसे 16 कोटड़ी में भी गिना जाता है । वर्तमान जिला मुख्यालय से 6 कि0 मी0 दूर ग्राम पंचायत मुख्यालय एवम पुराने रियासत की मांची गढ़ी वीर भूमि के रूप में जानी जाती है l मांची एवम दीपपुरा ग्राम की जागीर हरिदास के वंशज जादौन राजपूतों के अधीन थी l यहाँ के राजपूत करौली रियासत की सेना में अपनी प्रमुख भूमिका निभाते थे l करौली के महाराजा हरबक्स पाल के समय में करौली के चारों ओर संकट के बादल मंडरा रहे थे l l

 

 करौली इतिहास में मांची के यदुवंशी राजपूतों ने अपनी वीरता का अलग ही उदाहरण दिया था । जोकि इतिहास के गर्भ में कहीं खो सी गई थी । उसे आप सबके सामने लाने का एक छोटा सा प्रयास हमारी करौलियनस की टीम ने किया है । Pic 3 बात सन् 1800 ईस्वी की है जब करौली पर महाराजा हरबख्श पाल जी का शासन था । उस समय मांची के ठाकुर साहिब श्री बख्त सिंह जी थे । जो एक कुशल योद्धा होने के साथ कुशल रणनीतिज्ञ भी थे । उस समय करौली पर हर तरफ से दुश्मनों के हमले हो रहे थे । कभी मुस्लिम लुटेरे तो कभी मराठा सेना करौली पर आक्रमण करती रहती थी । जिसके कारण करौली में अराजकता बड़ रही थी । Pic 4 उसी समय सन 1812 ई0 में नबाब मोहम्मद शाह नाम का लुटेरा अपनी 40,000 की सेना के साथ उत्तर दिशा से रियासत के गांवों को लूटता हुआ करौली की ओर बढ़ रहा था l

 

रास्ते में मांची ग्राम भी पड़ता था । मोहम्मद शाह ने मांची की तलहटी में आकर अपना डेरा डाल दिया था । जिसकी खबर ठाकुर बख्त सिंह जी को पहुंची और उन्होंने तुरंत सहायता का खालिता करौली दरबार में पहुंचाया परंतु वह जानते थे के सेना को यहां पहुंचने में समय लग सकता है । तो उन्होंने स्वयं ही इस खतरे से निपटने का मन बनाया । और अपने साथी राजपूतों से मंत्रणा की और आने वाले खतरे के बारे में जानकारी दी और अपनी मंशा बताई । जिसे सुनकर सभी यदुवंशी राजपूतो ने उन्हें अपना समर्थन दिया । 

उसके बाद ठाकुर बख्त सिंह जादौन अपने 4 पुत्र और अन्य 460 राजपूतों को लेकर तलहटी के छोर पर शाह का इंतजार करने लगे । 

शाह की फौज जैसे ही पहाड़ी पर चढ़ने लगी तभी मांची के यदुवंशी शेर उन पर टूट पड़े । मोहम्मद शाह की सेना को पहाड़ी में लड़ने का अनुभव नहीं था । जिसके कारण राजपूत वीरो ने उन्हें गाजर मुली की तरह काट दिया था । जिसके कारण शाह की सेना में भगदड़ मच गई और वह अपनी जान बचा कर भाग खड़े हुए । 

इस युद्ध में मुस्लिम पक्ष के 10,000 के आस पास की लोग हताहत हुए । जबकि राजपूत पक्ष के लगभग 100 लोग वीरगति को प्राप्त हुए । करौली दरबार में जब इस युद्ध की जानकारी दी गई थी। तब करौली महाराज ने इस वीरतापूर्ण युद्ध के बारे में उल्लेख करने वाली कहावत " मांची नें साँची करी,दीनी फौज भगाय " बोली थी जो आज भी पुराने लोगों की जुवान पर है l करौली महाराज ने मांची के वीर राजपूतों की बहादुरी पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए वीरों को सम्मानित किया l तभी से मांची के वीरों की रियासत में पहचान बन गई l आज भी उन वीरों के खंडहर अपने अतीत की शौर्य गाथा सुनाई पड़ते है । 

यहाँ के राजपूतों ने भारतीय सेना एवम सुरक्षा बलों में सम्मिलित होने के बाद अदम्य साहस एवम वीरता का परिचय देकर करौली का नाम रोशन किया है l मांची के अंतिम जागीरदार ठाकुर साहिब भँवरसिंह जादौन थे l आज ग्राम पंचायत मांची के नाम से है किन्तु पंचायत में मांची की विखरी आबादी , मांची डांगरिया, विरवास ,दीपपुरा ,पहाड़ी मीरान एवम पड़ाव मक्खुसिंह एवं करौली शहर में आबाद है । 

 

:- आशीष पाल करौली (टीम करौलियनस )

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