इतिहास ए यदुवंश (महाराजा भंवर पाल जी )

इतिहास ए यदुवंश (महाराजा भंवर पाल जी )


महाराज भंवर पाल जी देव बहादुर

इनके बाद हाड़ौती के राव भंवर पाल जी सन 1886 में गद्दी पर बैठे । इन्हे शेर पालने का बहुत शौक था । यह हमेशा अपने साथ दो पालतू शेर (बाघ) रखते थे ।

1903 में यह अपने पालतू शेरो के साथ दिल्ली दरबार में गए थे ,जहां शेरों को देखकर पूरा दरबार हॉल भयभीत हो गया था ।

इन्हे अंग्रेजी,हिंदी और संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान था ।यह कलाप्रेमी और विद्वानों के आश्रयदाता थे । इनके समय में करौली को लघु काशी भी कहा जाता था । इन्होने भंवरवाणी नमक पुस्तक भी बनवाई थी ।

इन्होने कैलादेवी में बड़ी धर्मशाला की नींव भी रखी थी । इन्होने करौली रियासत की पुलिस की वर्दी सन 1911 में चालू करवाई थी ।

इन्होने क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ाने के लिए भंवर बैंक की स्थापना सन 1922 में की थी । सन 1923 में करौली को विधुत प्रकाश मिला था ।

इनके अलावा इनके समय में भंवर चिमन सिंह प्रकरण काफी मशहूर हुआ के कैसे एक मुँह लगा दास करौली का बेताज राजा बन गया था । जिसका शासन पर प्रभाव महाराजा भंवर पाल जी से काम नहीं था । चिमन सिंह ने रियासती खजाने का दुरूपयोग करने के साथ साथ भाइयो में आपसी वैमन्सयता का बीज भी ऐसा बोया था ,जो इन भाईयो में जीवनपर्यन्त रहा ।

इसके अलावा भी बहुत ऐसे कार्य किये थे चिमन सिंह ने जो राजपरिवार से जुड़े लोगो को पसंद नहीं थे, जिसके कारण ब्रटिश सरकार की मदद से चिमन सिंह का करौली से निष्कासन हुआ था । पिता के निष्कासन से बौखलाए चिमन सिंह के पुत्र मदन सिंह ने करौली रियासत के खिलाफ स्वतंत्रता का झंडा लेकर बेगार पर बलिदान का नारा देकर सत्याग्रह पर बैठ गया था ।

आश्चर्य का विषय है कि जब चिमन सिंह जी प्रभाव में थे तब मदन सिंह जी को यह ध्यान नहीं आया था । खैर महाराजा भंवर पाल जी ने इनकी सारि मांगे मान ली और सत्याग्रह समाप्त करवाया । मदन सिंह ने सत्याग्रह तो समाप्त कर दिया था परन्तु अब इसे रियासत का भय सताने लगा जबकि भंवरपाल जी के मन में संभवतः ऐसा कोई विचार नहीं था ।

लिहाजा मदन सिंह चुपचाप अपने पिता के पास वृंदावन चला गया फिर लौटकर करौली को नहीं देखा ।

इन्होने अपने भाई राव हाड़ौती भौम पाल जी को खूबनगर कि गढ़ी में नजरबन्द किया था जिसकी सभी जगह निंदा हुई थी ।

इनके शासनकाल में बड़े पांचना का पुल और हाई स्कूल का निर्माण हुआ ।

सन 1927 में इनकी पीठ में एक फोड़ा हुआ था । जिसकी वजह से 3 अगस्त 1927 को इनका निःसंतान रहते हुए देहांत हो गया था ।

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