इतिहास ए यदुवंश (महाराजा तुरसन पाल-महाराजा हरबक्श पाल)

इतिहास ए यदुवंश (महाराजा तुरसन पाल-महाराजा हरबक्श पाल)


महाराजा तुरसन पाल

गोपाल सिंह जी के बाद इनके चचेरे भाई हाडौती के तुरसन पाल सन् 1757 में गद्दी पर बैठे । इनके समय में अपराधो में कमी थी और भरष्टाचार भी नगण्य था । इन्होंने सुरक्षा और लगन वसूली के लिए अलग से चौकियों/चबूतरों का निर्माण करवाया था । इन्होंने नहरपुरी की लड़ाई जीती थी और सिकरवारो को हरा कर राज्य का विस्तार किया था ।

हिंडौन के केशोराय मंदिर के लिए विग्रह करौली से इनके द्वारा ही गया था । विरासत में जो इन्हें राज्य मिला उसको बनाए रखा और मराठो को आगे बढ़ने से रोका । इनके 3 पुत्र थे ।

मानक पाल :- गद्दी के वारिस

जवाहर पाल :- जवाहरगढ़ी बसाया ।

निहाल पाल :-मंडरायल रहे , निहाल सागर कुंप बनवाया ।

 

महाराजा मानकपाल

maharaja manakpal

महाराजा तुरसन पाल जी की मृत्यु होने पर उनके पुत्र मानकपाल गद्दी पर दिनांक 24.10.1772 को विराजे । इनका समय आजरकता पूर्ण रहा । हर तरफ लूट, अत्याचार का खुला तांडव खेला जा रहा था । जिसका भारी नुकसान करौली की भी उठाना पड़ा ।

उस समय की एक प्रचलित कहावत है कि "बवन्ना की साल में लीनी ही गोपाल,भोगी तुरसन पाल और खोई मानक पाल " गद्दी पर बैठने के बाद इनका युद्ध रोड़जी सिंधिया से हुआ जिसमे इन्हें विजयश्री मिली ।

इसके बाद सन् 1783 में नवाब हमदानी ने करौली पर हमला कर दिया । जिसका जवाब महाराजा मानक पाल ने दुहरे आक्रमण से दिया और हमदानी को मार भगाया । मराठो द्वारा दक्षिण हिस्सों को छीन लेने का दुःख इन्हें बहुत था ।

एक बार सन् 1787 में तुंगा में मराठो और राजपूतो का युद्ध हो रहा था । जिसकी रसद करौली होकर जा रही थी । जिसे मानक पाल ने अपने सैनिको से लुटवा कर जहां राजपूतो की मदद की वही मराठो से अपना प्रतिशोध भी लिया ।

इनके 2 पुत्र थे ।

अमोलक पाल :- कुंवर पदवी पर ही गुजरे ।

हरबक्स पाल :- गद्दी के वारिस हुए ।

कुंवर अमोलक पाल जी भी बहुत वीर पुरुष थे । मराठो द्वारा चम्बल पार का हिस्सा छीन लेने का इन्हें बहुत दुःख था । इन्होंने मराठी सेना को हराने के लिए अपनी अलग पलटन का गठन किया था । जिसे यूरोपियन अफसरों से प्रशिक्षित करवाया गया था । परन्तु इनके जल्दी चले जाने के कारण, यह उन्हें वापिस नही जीत पाए । इन्होंने रियासती बगावतो को ख़त्म करके राज्य में शांति स्थापित की थी । इनकी मृत्यु कम उम्र में होना करौली के लिए अपूर्ण क्षति थी ।

 

महाराजा हरबक्स पाल

maharaja harbaksh pal

महाराजा मानकपाल जी की मृत्यु के बाद उनके दूसरे पुत्र हरबक्स पाल जी सन् 1804 में गद्दी पर बैठे थे । इनके शासन काल में चारो और युद्धो का जोर था ।

1812 में करौली पर दो हमले हुए , पहला मुहम्मद खान जो एक लुटेरा था ,वह रियासती गांवो को लूटता हुआ बढ़ रहा था ,उसे और उसकी 50 हजार से भी ज्यादा की सेना को माँची के 130 राजपूतो ने मार भगाया था , करौली प्रचलित एक लोकोक्ति भी है कि "माँची ने साँची कर दिनी फ़ौज भगाए " इसी तरह जयपुर कि बागी उड़ाई खान और रणमस्त खान ने रियासतके पूर्वी क्षेत्र पर हमला करके उससे लूट लिया ।

इसके बाद जॉन बेपटिस्ट के साथ मराठी फौज ने दक्षिणी भाग पर हमला के दिया ,जिसका प्रतिरोध करके उन्हें करौली पर हमला करने से पूर्व ही कमजोर करके वापिस भेज दिया । लगातार युद्दों की वजह से यह परेशान रहने लगे , आए दिन कोई ना कोई विपदा आ जाती थी ।

ऐसी स्थिति में इन्होने मित्रता ,एकता और सुरक्षा के लिए 9 नवम्बर 1817 को 6 खंडो वाली संधि के तहत ईस्ट इंडिया कम्पनी से मित्रता कर ली । 1826 में भरतपुर की दूसरी लड़ाई में इन्होने राव दुर्जनसाल की मदद कर अंग्रेजो की खिलाफत की । जिसके बाद भी अंग्रेजो ने करौली को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाया । 1831 में इनायती के ठाकुर ने रियासत के खिलाफ विद्रोह किया था जिसे समय रहते सख्ती से दबा दिया गया था । इनके मरने के बाद इनकी रानी सुगन विलास ने गर्भवती होने का ढोंग रचा जोकि 12 वर्ष चला ।

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