इतिहास ए करौली ( महराजाधिराज गोपाल सिंह जी )

इतिहास ए करौली ( महराजाधिराज गोपाल सिंह जी )


महाराजा श्री गोपाल सिंह जी महाराजा कुंवर पालजी की मृत्यु के बाद सन 1724 को महाराजा श्री गोपाल सिंह जी का राज्याभिषेक बड़ी धूमधाम के साथ हुआ ।

यह प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप की भांति वीर और रैदास की भांति कृष्ण भक्त थे ।

 

इनका कथन था कि ''राजपुताना में शक्ति है ,वीरत्व है परन्तु एकता नहीं है जिस दिन यह आ जाएगी हम सम्पूर्ण दुनिया को जीत सकते है''

 

एक बार नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला करने कि तैयारी करके सरहिंद आ गया था तब बादशाह मुहम्मद शाह ने समस्त राजपुताना रियासतों से सहायता मांगी, इस पर समस्त रियासतों (जिसमे जयपुर और भरतपुर भी शामिल थे ) ने मिलकर विचार किया जिसमे गोपाल सिंह जी ने सुझाव दिया के "मुग़ल साम्राज्य कि सहायता न कि जाए अन्यथा राजपूताने पर भी हमला हो सकता है" जिसे सर्वसम्मति से मान भी लिया गया । जिसके परिणामस्वरूप राजपुताना को नादिरशाह के आक्रमण से बचा लिया गया ।

महाराजा गोपाल सिंह जी के समय राजपुताना रियासतों के आंतरिक संघर्ष का फायदा उठा कर राजपूताने की शक्ति को कमजोर करके चौथ वसूली आरम्भ कर दी थी ।

जयपुर महाराजा सवाई जयसिंह ने इसके खिलाफ समस्त राजपुताना को एक करने का प्रयास किया ।

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जुलाई 1734 में सवाई जयसिंह ने सभी राजाओ की एक सभा मेवाड़ के अंगोचा गांव के पास हुरड़ा नामक स्थल पर की थी, जिसमे सवाई जयसिंह ,जौधपुर के महाराज अभय सिंह ,नागौर के बख्त सिंह,बूंदी के राव दलेल सिंह,करौली नरेश गोपाल सिंह और बीकानेर ,किशनगढ़ आदि छोटे बड़े सभी राजा एकत्रित हुए ।

इस सभा के अध्यक्ष मेवाड़ के राणा जगत सिंह थे और उपाध्यक्ष करौली महाराज गोपाल सिंह जी थे ।

जिसमे 5 सूत्रीय निर्णय के साथ सभी ने सहमति के रूप में हस्ताक्षर किये परन्तु अंदरूनी बदनीयती के कारन यह सफल न हो सका ।

इनके शासनकाल में रोड़जी सिंधिया ने करौली पर हमला किया और मारा गया , उसकी छतरी बरखेड़ा गांव में बनी हुई है ।

इन्होने दिल्ली के बादशाह फरुखसियर के टांका वसूली का विरोध कर इस प्रथा को समाप्त करवाया था ।

इन्होने नागासाधुओं की मदद से सवा दो मील का लाल पत्थर का परकोटा बनवाया था, जिसमे 6 दरवाजे और 12 खिड़किया है ।

सन 1752 में इन्होने सबलगढ़ ,विजयपुर (इस समय मध्यप्रदेश में है ) जीत कर करौली राज्य का विस्तार किया ।

सबलगढ़ के चारो और परकोटा बनवाया था । इन्होने कवारी नदी तक अपना राज्य विस्तार किया था ।

गोपाल सिंह जी की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर जयपुर में विराजमान मदन मोहन जी ने इन्हे स्वपन दिया के राजन में ब्रजभूमि (करौली भी ब्रज क्षेत्र में आती है ) आना चाहता हूँ ।

गोपाल सिंह जी ने यह बात अपने बहनोई सवाई जयसिंह को बताई ।

प्रमाण के लिए आँखों पर पट्टी बांध कर वह राखी तीन मूर्तियों में से अपने इष्ट देव मदन मोहन जी को पहचान कर सन 1742 में करौली लाए और रावल महल में पधराया, बाद में नया मंदिर बनवा कर देवालय में सन 1748 में पधराया और मदन मोहन जी को करौली राजपरिवार के कुलदेवता घोषित करके राज्य चिन्ह में ''मदन मोहन जी सदा सहाय'' अंकित करवाया ।

इन्होने सन 1730 में कैलादेवी मंदिर के पुर्निर्माण की व्यवस्था की और कुंड का निर्माण करवाया ।

इन्होने ही वासीखेड़ा गांव से चामुंडा माँ की मूर्ति लाकर कैला माँ के बगल में पधराया था इनकी स्थापत्य कला में बहुत रुचि थी ।

इन्होने महलो में गोपाल मंदिर , आम खास ,त्रिपोलिया , नगाड़खाना आदि बनवाए थे ।

 

जिसे देखकर ब्रटिश गवर्नर जनरल कोटिंग ने लिखा है कि “in the same respect the finest building of the fort ” ।

 

इनके काल में यदुनाथ कवि ने ''वृत्त विलास'' ग्रन्थ कि रचना कि थी ।

इनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि जयपुर,जोधपुर,कोटा,उदयपुर,भरतपुर के राजा इन्हे बहुत आदर और सम्मान देते थे ।

इनके परलोकगमन के बाद इनकी रानी देवकुंवर ने इनकी छतरी इनके पिताजी कि छतरी के निकट बनवाई थी ।

आज भी करौली और सबलगढ़ कि जनता इन्हे देवता के रूप में पूजती है ।

इनके परलोकगमन पर कहा गया है के..... 

 

‘’महाराजा गोपाल के चलत भयो करौली में शोक। हाय-हाय जब नगरी करे,जय जय जय परलोक ।।‘’

 

गोपाल सिंह जी के रानियों से कोई औलाद नही थी । (खवासवार जोरावर सिंह को देवगिरि जागीर दी गई थी ।)

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