इतिहास ए करौली ( महाराजा धर्म पाल जी तृतीय - महाराजा रतन पाल जी )

इतिहास ए करौली ( महाराजा धर्म पाल जी तृतीय - महाराजा रतन पाल जी )


महाराजा धर्म पाल तृतीय

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महाराजा धर्म पाल तृतीय महाराजा छत्रमणि जी के बाद इनके पुत्र धर्म पाल तृतीय गद्दी पर सन 1644 में विराजे ।

धर्म पाल जी करौली के प्रथम राजा थे जिनकी गद्दी नशिनी करौली दुर्ग में हुई थी ।

करौली को पूर्ण राज्य का दर्जा इनकी के समय में मिला था ।

इन्होने एक कोट भी बनवाया था जो बाद में फुट गया और कालांतर में फुटाकोट के नाम से जाना जाता है ।

इन्होने कई विद्रोह का दमन किया था , साथ ही करौली राज्य की सुरक्षा और विकास पर भी ध्यान दिया ।

इनके देहांत के बाद इनकी छतरी करौली में नदी दरवाजे के बाईं और बनी हुई है । जहाँ आज भी लोग मनौती मानते है ।

इनके 6 पुत्र हुए ।

रतन पाल :- गद्दी के वारिस हुए ।

राव किरतपाल (कीर्ति पाल ) :- हाड़ौती के राव हुए, औलाद परदमपुरा,रूपपुरा,खूबपुरा में आबाद ।

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जसपाल :- जसपुरा के जागीरदार बने ।

भोजपाल :- रामठरा आबाद किया, औलाद रामठरा में आबाद ।

गुमान पाल :- भोजपाल जी के बाद रामठरा के जागीरदार बने ।

जयसिंह पाल :- औलाद करौली/सबलगढ़ में आबाद ।

हेमपाल :- सपोटरा के जागीरदार बने ।

प्रयागपाल (प्राण पाल ):- जवाहरगढ़ के सूबेदार बने ।

उदै पाल :- हेमपाल जी के बाद सपोटरा के जागीरदार बने ।

भगवानदास :- लाऔलाद गए ।

 

महाराजा रतन पाल

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 महाराजा धर्म पाल जी की मृत्यु की बाद इनके पुत्र रतन पाल जी गद्दी पर सन 1665 में गद्दी नशीन हुए ।

इनका शासन काल शांतिपूर्ण रहा । यह कविता प्रेमी थे और कवियों को अपना आश्रय प्रदान करते थे ।

देवीदास नामक कवि इनके दरबार में थे जिन्होंने प्रेम रत्नाकर ग्रंथ लिखा ।

इनसे किसी कार्यवश नाराज होकर गब्बा चौबे ने गद्दी को लाऔलाद होने का श्राप दिया था । जिसका प्रभाव महाराजा गोपाल सिंह जी की बाद से देखने को मिला ।

इनके 9 पुत्र थे ।

हीरापाल :- कुंवर पदवी पर गुजरे ।

कुंवरपाल :- गद्दी की वारिस ।

मोहनपाल :-औलाद कभी मोजे कोंडर में रही ।

अखैपाल :- छतरी वर्तमान अपजमण्डी कुज में है ।

मोतिपाल :- लाऔलाद रहे ।

भगोतपाल :- लाऔलाद रहे ।

वीरमपाल :- लाऔलाद रहे ।

खरगपाल :- लाऔलाद रहे ।

उदयपाल :- लाऔलाद रहे ।

 

महाराजा कुंवरपाल जी महाराजा

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रतन पाल जी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कुंवर पाल जी सन 1688 में गद्दी नशीन हुए ।

इन्होने 36 वर्ष राज्य किया । यह धर्मप्रिय राजा थे,इनकी गिनती शांतिप्रिय राजाओ में होती थी ।

इनकी छतरी महाराज गोपाल सिंह जी के बगल दूसरे चबूतरे पर है , जिसे इस समय लोग सतियो की छतरी के नाम से जानते है ।

इनके एक पुत्र थे , गोपाल सिंह जी जो गद्दी के वारिस हुए ।

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