इतिहास ए यदुवंश (ऊंटगिरि )

इतिहास ए यदुवंश (ऊंटगिरि )


महाराजा चन्द्रसेन

maharaja chandra sen

महाराजा चन्द्रसेन महाराजा प्रतापरुद्र के बाद इनके दूसरे पुत्र चन्द्रसेन की गद्दी पर सन् 1506 में विराजे ।

इनके व्यक्तित्व के बारे में बताया जाता है कि ये भगवत भक्त और करामती थे । भगवत भक्ति में लीन रहने के कारन इन्हे फ़क़ीर महाराजा साहब के नाम से भी जाना जाता था ।

इनकी पलकों के ऊपर भौंह के बाल इतने बड़े थे कि उन बालो से मुँह ढँक जाता था ।

एक बार बादशाह अकबर आगरे के लाल किले की नींव लगवाने कि लिए ऊंटगिरि दुर्ग आए और महाराजा चन्द्रसेन जी से साथ चल कर नींव लगाने का आग्रह किया तब चन्द्रसेन जी ने उम्र अधिक होने कि कारन चलने में असमर्थता जताई और अपने पौत्र गोपालदास जी को इस कार्य हेतु भेजा ।

सन 1566 में आगरा किले की नींव भंवर गोपालदास जी द्वारा रखी गई ,इसका शिलालेख आज भी आगरा किले में लगा हुआ है ।

इनके 6 पुत्र थे ।

भारतीचंद :- कुंवर पदवी पर गुजरे ।

जयसिंह :- औलाद भूदा जादौन कहलाए ।

देवबक्स :- औलाद खूबाजू जादौन कहलाए ।

मानसिंघ :- औलाद दक्षिणी जादौन ,अब मराठाओ में है ।

बल्लभचन्द :- लाऔलाद गए ।

भगवानदास :-औलाद पंचभैया जादौन ,दक्षिणी भारत में है ।

 

चन्द्रसेन जी के जीवनकाल में ही भारतीचन्द्र जी गद्दी पर बैठे । इनके बारे में इतिहास मौन है ।

इनके 7 पुत्र थे

गोपालदासजी :- गद्दी के वारिस हुए ।

खांडेराव :- औलाद रामपुर में आबाद ।

भवानीदास :- औलाद खण्डार(स.माधोपुर ) में आबाद है ।

सूरजमल :- औलाद उदावत जादौन , देवगिरि में आबाद ।

धर्मा :- लाऔलाद गए ।

मानसिंह :- लाऔलाद गए ।

इनैसिंह :- लाऔलाद गए ।



महाराजा गोपालदास

maharaja gopaldas ji

महाराजा गोपालदास भारतीचन्द्र जी की मृत्यु के बाद इनके पुत्र गोपालदास जी सन 1566 में गद्दी पर विराजे यह सर्वगुण संपन्न व असामान्य प्रतिभा के धनी थे साथ ही उच्च कोटि के सेनानायक भी थे ।

इनका विवाह आमेर की राजकुमारी रसकंवर के साथ हुआ था |

यह अकबर के दरबार में मनसबदार थे और अकबर से इन्हे महोभरपात की उपाधि और रणजीत नक्कारा प्रदान किया गया था । इन्होने अकबर की सेना में सेनानायक की भूमिका में अनेक युद्ध जीते थे ,जिनमे दौलताबाद का युद्ध प्रमुख है ।

 वहा से गोपाल जी की मूर्ति भी लाए जोकि आज भी करौली राजपरिवार की पूज्य है । और मदन मोहन जी के बगल में स्थापित है ।

यह अपनी राजधानी ऊंटगिरि से बहादुरपुर ले गए थे ।

इन्होने अपने पूर्वज अर्जुन देव जी के बाद करौली को राजधानी बनांने पर कार्य किया  एवं विद्रोहियों का दमन करके कार्य को आगे बढ़या ।

सही मायनो में करौली शहर के स्थापक यही है । इनके 3 पुत्र थे |

द्वारिकादास :- गद्दी के वारिस हुए ।

मुकुटदास :- औलाद मुक्तावत जादौन कहलाई ।

तुरसम बहादुर :- औलाद बहादुर के जादौन कहलाई ,बहादुरपुर,सबलगढ़ में आबाद ।

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