इतिहास ए यदुवंश (तिमनगढ़)

इतिहास ए यदुवंश (तिमनगढ़)


महाराजा तिमन पाल जी

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विजय पाल जी के सबसे बड़े बेटे तिमन पाल जी 2 साल तक लापता रहे , वापस आके सैनिक संगठन की तैयारी में डान्ग में सक्रिय रहे | एक दिन डान्ग में जंगली सूअर का पीछा करते हुए एक जगह पहुचे जहां तपस्या करते हुए बूढ़ा बैरागी मिला |

मेढकीदास/खुदारसीदास नाम के बैरागी ने जब तिमन पाल जी को देखा तो पूछा की हमारी गौ का पीछा क्यों कर रहे हो ,जब तिमन पाल जी ने देखा तो उन्हें भी सूअर की जगह गौ दिखाई दी | बैरागी के चमत्कार से प्रभावित होकर तीमन पाल जी ने बैरागी को अपना दुखडा सुनाया और सहायता मांगी |

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बैरागी ने खुश होकर भाला और पारस पत्थर दे कर तीमन पाल जी से कहा जहाँ जाके तुम्हारा घोडा रुके वहा भाला गाढ़ देना , वही जल स्रोत मिलेगा उसके पास ही अपना किला बनवाना |

तीमन पाल जी साधू महाराज से आज्ञा लेकर डाँग के अंदर चल दिए | घोडा बीहड़ और वीरान जंगल में एक पहाड़ी की तलाई में रुका , वहां भाला गाड़ते ही जल स्रोत फुट पड़ा जिसे बाद में लोग सागर के नाम से जानने लगे उसके ऊपर ही पहाड़ी पर तीमन पाल जी ने पुष्य नक्षत्र में सन् 1048 में किले का निर्माण शुरू किया |

9 किमी के घेरे में बना यह किला सन् 1058 में बनकर तैयार हुआ और तीमन पाल जी तीमनगढ़ की गद्दी पर विराजे ,उस समय तीमन गढ़ को त्रिपुरानगरी या त्रिभुवनगढ़ के नाम से भी जाना जाता था |

राज्य में राजस्व(कर ) के रूप में पैसा या अनाज न लेकर लोहा लिया जाता था ,जिसे पारस पत्थर की सहायता से सोना बनाया जाता था |

तीमन पाल जी ने दुर्ग की ऊँची प्राचीरों का निर्माण करके दुर्ग को सुरक्षित किया एवं अंदरुनी व्यवस्था के लिए फौजी चौकिया बनवाई और आम जनता के लिए फर्श बंदी के बाजार , कुए एवं मंदिरो का भी निर्माण किया और शाही रहवास के लिए महलो का भी निर्माण करवाया |

तीमन पाल जी ने जहा सम्पूर्ण डाँग क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित किया वहीँ अपने राज्य को भरतपुर ,धौलपुर और अलवर तक फैला दिया |

इन्होंने तिमनगढ़ पर कुल 32 वर्ष शासन किया | तीमन पाल जी की कुल 20 रानिया थी,जिनमे से 2 खब्बास थी | करौली की तवारीखो के अनुसार महाराजा तीमन पाल जी के 7 बेटे हुए |

धर्म पाल :- गद्दी के वारिस ।

सोमदेव :---------------

ईलाजी :----------------

बिलोजी :---------------

देव पाल :- ये खब्बास रानी से थे ।

बलभद्र पाल :- ये खब्बास रानी से थे ।

हरपाल :- खब्बास गुज्जरी से |

वहीँ करौली की ख्यातो में धर्म पाल :- गद्दी के वारिस ।

सुआपाल :- औलाद सिनसिनवार जाट भरतपुर में आबाद ।

हरी पाल :- औलाद गुज्जर,टटवाल,तमोली में है ।

उदय पाल :- औलाद छोंकर/पौरस जादौ कहलाई ,औलाद सोराबाद,अलीगढ,हाथरस में आबाद ।

नंदपाल :- ब्रजवासी जादौ कहलाए ।

देवपाल :- औलाद मेवाती मुसलमान हुई ।

नागराज :- औलाद बढ़ेरिया मीणा हुई ।

टोडरमल :- लाऔलाद रहे ।

ब्रह्मपाल :- औलाद भरोलिया जाट हुई ।

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महाराजा तीमन पाल ने अपने राज्य का विकास कर अमन चैन कायम किया एक दिन तीमन पाल जी बहुत चिंतित थे ,अपनी नीली घोड़ी और हीरे को लेकर जो बयाना पर हमला करके यवन गजनी ले गए थे इन्होंने यह व्यथा अपने बड़े बेटे धर्म पाल को बुलाकर कही क्योंकि तिमन पाल जी वृद्ध हो चुके थे लेकिन धर्म पाल जी दूर की लड़ाई से कतराते थे वह तैयार नही हुए गजनी जाने को एक दिन की बात है खब्बासकर हरी पाल ने स्वयं के उपयोग हेतु तीमन पाल जी से घोड़ी की मांग की, तीमन पाल जी ने कहा आज तो तुम मेरी घोड़ी मांगते हो कल को मेरी गद्दी भी मांग लोगे यदि घोड़ी चाहिये तो गजनी से ले आओ फिर आगे कुछ करेंगे |

हर पाल कुछ सहयोगियों को साथ लेकर गजनी जा पंहुचा और अपनी चतुराई से घोडी और उसके बच्चों को लेकर गजनी से तिमनगढ़ को आया हालांकि गजनी की फौज ने इनका पीछा किया परन्तु हर पाल उन्हें तिमनगढ़ ले आए और महाराज तीमन पाल जी को नजर कर दी |

कहते है घोड़ी देवरूप थी, महाराजा विजय पाल जी के अलावा किसी को इसने अपने ऊपर नही बैठने दिया था | सुल्तान ने भी काफी प्रयास किये पर वह भी असफल रहा |

हर पाल की बहादुरी और होशियारी से खुश होकर महाराज ने तिमनगढ़ राज्य बड़े बेटे धर्म पाल को दिया लेकिन छोटे बेटे हर पाल को शासन के सरे हक़ हुक दिए जिस कारण वह राज्यकार्य में हस्तक्षेप कर सकता था |

महाराज धर्म पाल द्वितीय

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ईस्वी 1089 में तीमन पाल जी के परलोकवासी होने के पश्चात् धर्म पाल जी का राज्याभिषेक तिमनगढ़ की गद्दी पर हुआ लेकिन हरपाल का राज्य में हस्तक्षेप इस कदर हावी था की धर्म पाल जी नाम मात्र के शासक रह गए, यही से भाइयो में कलह बढ़ता गया |

एक दिन धर्म पाल जी तिमनगढ़ छोड़कर कुछ सिपाहियो को साथ लेकर घने जंगलो से होकर चम्बल किनारे चले गए वहां पडे खंड़हरो को फिर से खड़ा कर धोलाडेरा बसाया जो वर्तमान में धौलपुर कहलाता है |

तिमनगढ़ को हाकिम हरपाल के जिम्मे छोड़कर स्वयं धौलपुर में शासन् करते रहे बाकि भाई भी तिमनगढ़ छोड़कर चले गए |

धर्म पाल जी ने 7 शादिया की जिनसे 2 लड़के हुए कुंवर पाल जी गद्दी के उत्तराधिकारी हुए और बदन पाल जी इनके वंशज गोह्जे जादौन कहलाये |

धौलपुर में शासन करते हुए ईस्वी 1095 में गोलारी में एक किले का निर्माण करवाया जिसे कुंवरगढ़ी कहते है ,कुँवरपालजी भी कुंवरगढ़ी में रहकर मौके की तलाश में रहे , क्योकि तिमनगढ़ में कुँवरपालजी का आना जाना रहता था ,एक दिन तिमनगढ़ किले में मौका पाकर अपने चाचा हरिपाल को मारकर तिमनगढ़ पर कब्जा कर लिया |

 धौलपुर से अपने पिता धर्मपालजी को बुलाकर पुनः तिमनगढ़ की गद्दी पर बैठाया और बदनपालजी को धौलपुर के किले पर ही व्यवस्था के लिए छोड़ दिया |

कुछ समय बाद बयाना पर हमला कर उसे भी यवनो से मुक्त करवा लिया था | इस प्रकार से पुनः यदुवंशियो का राज बयाना , तिमनगढ़ पर हो गया था |

कुछ समय बाद तिमनगढ़ पर राज्य करते हुए धर्म पाल जी का स्वर्गवास हो गया था |

महाराज कुंवर पाल जी

ईस्वी 1194 में मोहम्मद गौरी ने हमला कर दिया घोर सँघर्ष हुआ और उसने बयाना और तिमनगढ़ पर कब्ज़ा कर लिया , इस युद्ध में ज्यादातर राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए और क्षत्राणियों ने भी वीभत्स जौहर किया |

करौली की ख्यातो के अनुसार कुंवर पाल जी भी युद्ध भूमि में वीरत्व को प्राप्त हुए | परन्तु कुछ इतिहासकारो का मत है के वह युद्ध भूमि से भाग कर अंधेर कटोला चले गए थे या फिर कही पलायन कर गए थे | इनके 4 पुत्र हुए ।

अजै पाल :- गद्दी के वारिस ,औलाद करौली के जादौन ।

कंयमपाल :- औलाद ढँढोरिया जादौ कहलाई ।

आनंदपाल :- औलाद आवागढ़ में आबाद ।

मनोहरपाल :- औलाद जमींदार बुलंदशहर में

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