इतिहास ए यदुवंश (बयाना )

इतिहास ए यदुवंश (बयाना )


 

महाराजा विजय पाल जी

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सन् 1018 में महाराजा विजय पाल जी गजनवी के आक्रमणों के  कारण अपनी राजधानी मथुरा से राजस्थान के बयाना में मणिपहाड़ी पर बसाई |

महाराजा विजय पाल जी ने 51 वर्ष शासन किया इन्होंने कुल 35 लड़ाईया लड़ी जिनमे होने वाली जीत में इन्हे विजयाधिराज भी कहा गया है |

इन्होंने आगरा,दिल्ली,दक्षिण में तेलंगाना और पश्चिम से होने वाले हमलो को भी काबुल कंधार तक खदेडा  |

एक बार मालवा के ख़िलजी को वापिस आते हुए बयाना में हार का सामना करना पड़ा, जिसकी याद मे बयाना के किले में विजय स्तम्भ स्थापित किया गया, जिसे भीमलाट भी कहते है |

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इसके कारण मुस्लिम खेमो में खिलाफती तैयारिया जोर पकड़ती गई,

कुछ  सैनिको ने नमक हरामी करके सैन्य ,खजाना और रास्तो के भेद अबु बक्र कंधारी के डेरे पर जाकर बता दिए |

सुल्तान मसूद द्वितीय के सेनापति अबु बक्र ने बयाना से 12 कोस दूर कनावर में डेरे लगाये ।

यह घटना सन् 1045 की है |

अबू बक्र कंधारी के नेतृत्व में मुस्लिमो ने संगठित होकर बयाना के किले को चारो और से घेर लिया |

जिससे किले के अंदर रसद खत्म हो रही थी और बाहर लाखो की संख्या में मुस्लिम टिड्डी दल था |

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आखिरकार वो अमर दिवस आ गया था जब यदुवंशी राजपूत अपने खून से इतिहास लिखने वाले थे तब यदुवंशी महाराज विजय पाल जी ने अपने पुत्र कुंवर गजपाल से कहा की अगर जीत हो और हमारे झंडे दिखे तो हमारी पीताम्बरी ध्वजा लहरा देना और मोहताजो को दान देना और अगर दुश्मनो के झंडे दिखे तो जनाना महल में बता देना की जौहर का समय आ गया है और जो भी बाकी बचे उन्हें लड़ने के लिए महल से नीचे ले आना और केसरिया बाना पहन कर वीरतापूर्वक लड़ना |

इसके बाद यदुवंशी केसरिया बाना पहन कर युद्ध में भूखे शेरो की तरह दुश्मनो पर टूट पडे | इस युद्ध में राजपूतो ने वो वीरता पूर्वक युद्ध किया के दुश्मनो की लाशे बिछ गई, कहते है की कुछ लाशे कम पड गई वरना बयाना दूसरा मक्का होता | दुश्मनो में कोहराम मच गया और वह वहां से दुम दबा कर भाग खड़े हुए | यादव राजपूतो ने उन्हें बहुत दूर तक खदेड़ दिया |

लेकिन इसके बाद कुछ ऐसी घटना घटी की युद्ध का दृश्य ही बदल गया |

जीत की ख़ुशी में यदुवंशी राजपूतो ने दुश्मनो के झंडे तक को नही छोड़ा,

वे ख़ुशी ख़ुशी में यादवो के पीताम्बरी ध्वज की जगह दुश्मनो के काले झंडे ले कर दुर्ग की और चल दिए 

उधर गज पाल बारहदरी से इंतजार कर रहे थे,

उन्होंने देखा के घुड़सवार हाथ में दुश्मनो के झंडे लिए दुर्ग की और बड़ रहे है उन्होंने सोचा के हमारे योद्धा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए है |

उन्होने यह खबर रनवास मे पहुँचा दी,

उसे सुन कर राजपूती वीरांगनाओ ने दुश्मनो से अपने शील और मान सम्मान की रक्षा के लिए दुर्ग में रखी बारूद में आग लगवा कर एक एक करके सभी वीर राजपुतनियो ने जौहर की ज्वाला में खुद को समर्पित कर दिया |

      कहते है कि उस दिन 360 राजपूतानियो ने मय दासियों के जौहर  की ज्वाला में खुद को समर्पित किया था |

अगले दिन जब विजय पाल जी मय लश्कर दुर्ग पर पहुंचे तब उन्हें यह समाचार मिला, इससे सुनने के बाद वह ऊपर दुर्ग में स्थित शिव मंदिर में जाकर कमल पूजा(अपना सर काट कर इष्टदेव को अर्पित करना ) करके अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली ,जिसे सुनकर अबू बक्र कंधारी ने वापस बयाना दुर्ग पर हमला कर दिया ,यदुवंशी राजपूत इस दुःख से ग्रसित होने के कारण अधिक प्रतिरोध नहीं कर पाए और पराजित हुए,इस प्रकार बयाना पर यवनो का कब्ज़ा हो गया था |

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विजय पाल जी ने 51 वर्ष शासन किया और 29 शादिया की जिनसे 18 पुत्र हुए जिनमे से 11 कनावर के युद्ध में काम आए |

इनके निम्न पुत्रो के नाम मिलते है  ।

तीमन पाल जी :- गद्दी के वारिस ,तिमनगढ़ आबाद किया  ।

उदय पाल जी :- क़स्बा उदेई खुर्द आबाद किया  ।

छतर पाल जी :- औलाद ओंगल जादौ कहलाई , गजनी गए पिता की मौत का बदला लेने  ।

गजपाल जी  :- औलाद, गजगढ़ (जैसलमेर) आबाद किया , मोरस जादौ कहलाई  ।

रतन पाल जी (मंडन पाल जी ) :- मडरायल किला बसाया  ।

बागपाल  :- बाधेर (सबलगढ़) काबिज हुए  ।

मदनपाल  :- औलाद सबखेरिया जादौ कहलाई  । 

मोतीपाल :- इनकी छतरी जगर बाँध के पास है ,जहां मेला लगता है, कनावर में काम आए  ।

अनेहपाल  :- औलाद खाणस जाट कहलाए  ।

हंसपाल  :- कनावर में काम आए  ।

पिरानपाल  :- कनावर में काम आए  ।

देवपाल  :- कनावर में काम आए  ।

रूपपाल  :- कनावर में काम आए  ।

कुंवरपाल  :- कनावर में काम आए  ।

सतपाल  :- कनावर में काम आए  ।

रामपाल   :- कनावर में काम आए  ।

गंगपाल    :- कनावर में काम आए  ।

सूरजपाल   :- कनावर में काम आए  ।

 

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