करौली दुर्ग

करौली दुर्ग - करौली शहर के मध्य में स्थित .....

करौली दुर्ग, करौली शहर के मध्य में स्थित पुराने शहर को अपने में समेटे हुए है खड़ा है । वर्तमान दुर्ग का निर्माण महाराजा धर्म पाल जी तृतीय ने करवा कर इसे अपने शासन की राजधानी घोषित कर करौली कि गद्दी पर विराजे थे । जिसके अवशेष आज भी करौली शहर में दिखाई देते है ।
जिसके बाद महाराजा गोपाल सिंह जी ने स्थानीय नागा साधुओं के सहयोग से सवा दो मील का लाल पत्थरों से बने परकोटे का निर्माण करवाया ।
इस नागा साधुओं के मठ करौली में काफी संख्या में स्थित है ।

करौली दुर्ग में 6 दरवाजे
1. हिंडौन दरवाजा
2.वजीरपुर दरवाजा
3.मासलपुर दरवाजा
4. नदी दरवाजा
5.घुर (गणेश) दरवाजा
6. मेला दरवाजा

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और 12 खिड़कियां अवस्थित है ।
खिड़कियां :- होली, सायनाथ, कायस्थ ,गुसाईं,चोर,सुकल,चमार,पठान,परसराम,गणगौरी,गोपाल सिंह जीकी और बैठे हनुमान जी की स्थित है ।
करौली राजवंश ने मुस्लिम वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर कबीर शाह और बरकत बाग की खिड़की अलग से बनवाई थी ।

करौली दुर्ग करौली राजवंश की सबसे आखिरी राजधानी रहा है । विक्रम संवत 1707 में करौली दुर्ग को अपनी राजधानी घोषित किया और गद्दी पर विराजे । जिसके बाद सन् 1947 में भारत की आजादी के बाद यहां के शासक महाराज गणेश पाल देव बहादुर ने भारत का हिस्‍सा बनने का निश्‍चय किया। 7 अप्रैल 1949 में करौली भारत में शामिल हुआ और राजस्‍थान राज्‍य का हिस्‍सा बना।

करौली को भद्रावती नदी के किनारे होने के कारण भद्रावती नगर भी कहा जाता था। महाराज गोपालसिंह के समय का एक खूबसूरत महल है जिसके रंगमहल एवं दीवाने आम को शीशों से बडी खूबसूरती से बनाया गया है। इस कस्बे में काफी संख्या में मन्दिर है जिसमें प्रमुख मन्दिर मदनमोहनजी का है। यह मन्दिर अंदर से बरामदे एवं सुसज्जित पेन्टिंग से सजा है प्रत्येक अमावस्या को मेला लगता है, जिसमें हजारो की संख्या में लोग दर्शनार्थ आते है करौली मे जैन मन्दिर, जामा मस्जिद, ईदगाह अंजनी माता मन्दिर,गोविन्द देव जी मन्दिर आदि भी धार्मिक आस्था के स्थान है।

करौली दुर्ग भारत के जीवित दुर्गों में से एक है जिसमे आज भी लोग रहते है :- team karaulians